Ratan kirtaniya 30 Mar 2023 कविताएँ राजनितिक भ्रष्टाचार चारों तरफ सूरज की रोशनी की तरह फैला हैंं इस कविता में भ्रष्टाचार की मर्मिक चित्रण है । 51779 0 Hindi :: हिंदी
सजा के मंडी -
गद्दी पे बैठ कर ;
ढोंग रचा रहा पाखंडी ,
ले के सब से वोट -
आघात किया दे के -
सब को चोट ;
तू भूल गया -
अपना परिचय ,
जो भी है तू -
है अपने माँ की लाल ;
माँ को बेच के -
हुआँ मालामाल ,
मिलेगा ! नल - चुम्बी सम्मान ,
नाम कमा रहे हो बेच के वतन ;
माँ की लाल -
माँ को बेचा कहलाओंगे दलाल ।
गद्दी पे बैठ के ढोंग रचा है ;
ऊपर से मत देखों -
अन्दर में एक साचा है ,
तरह - तरह के भाषाण -
प्रतिज्ञा करके देश को लूटा ;
बढ़ाया अपना शान ,
शैतान ने श्वेत नकाफ पहना है ;
माँ को बेच ने चले -
बेशर्म को और क्या कहना है ?
अधर्मी ने धर्म का नकाफ पहना है ,
देर है अंधेर नहीं -
होगा तेरा पर्दाफाश ;
टूट जाएगा हर -
तेरे उर में बसा आश ;
बुझाने के लिए प्यास ,
गाँधी के चक्की में -
काला धागा लपेटा है ,
अपना करतूत छुपाने के लिए -
वार्तालाप संग नयन तेरा रोया है ।
मोटा सेठ बनूँ बेच के वतन ;
बड़ा नाम होगा तेरा ;
जेब होगा गर्म -
छोड़ के लाज - शर्म -
बेचने जा रहा हूँ धर्श ;
आज बेच दूँगा ;
पैसे की लालच में -
बालपन में पीया जिस की स्तन ,
माँ को बेचने चली -
उस की लाल ;
भ्रष्टाचार बन गया देश का दलाल ,
माँ बेच के -
बनूँ वतन का सबसे बड़ा दलाल ।
गाँधी के चक्की में -
जो काला धागा लपेटा है ;
देख के मौका -
उसी ने मारा चौका ,
वतन को लूटने के लिए -
भूखे शेर की तरह झपेटा है ,
माँ को बेचने वाला और कोई नहीं -
खुद अपना बेटा है ,
काला धन श्वेत हो या ना हो -
पर श्वेत चहेरा के पीछे काला रुप है ;
सब देख रहे - समझ रहे हैं ;
पर सब छुप हैं ,
नकाफ तेरा उतर जाएगा ,
माँ को बेचने वाले -
नेताओं को दलाल ही कहलाएगा ।
माँ को बेच के -
बेटा बना दलाल ;
हे धरती माँ !
तुझे बेच खाया तेरा लाल ,
बोल के मीठा - मीठा -
उस ने देश को लूटा ;
ओ ही निकला बड़ा झूठा ,
बोलने के ढंग निराला ;
देखोंं देश को लूटने वाला ,
बन के जीजा - साला ;
भ्रष्टाचार के एकता में बड़ी शक्ति ,
खोया जा रहा देश भक्ति ,
क्रांति कहाँ खोया है -
दबा के सत् को -
जीजा - साला ने ;
धरती पे भ्रष्टाचार की बीज बोया हैं ,
उगल गया तेरी फसल ;
छनक उठी तेरी चाल
फसल ने बेचने चली वसुंधरा ,
भूल के हर सहारा ;
वसुंधरा को बेचने लगा फसल ;
चला उल्टी चाल ,
बना वतन का बड़ा दलाल ;
माँ को ही बेचने चली -
देखों उस की लाल ।
धड़क उठा लाल किला ;
नयन उस का गीला ,
दस महीनें जिस ने गर्भ में पाला ,
खिला - पीला के किया यौन - विस्तार ,
बन के काबिल ,
माँ के सीना चीर के ;
बेच ने चली माँ की दिल ,
माँ को बेचने वाला दलाल ;
पैसे के लिए कुछ भी कर जाऊँगा ,
जननी को बेच के -
सेठ बन जाऊँगा ,
देश को बेचना है हर हाल ;
गद्दी पे बैठ के -
चलाऊँगा शकुनि चाल ;
कौन माँ - कौन बहन ,
भले हो जाए -
सब के हलाल ,
माँ को बेच के उस का लाल ,
बना देश का बड़ा दलाल ।
सब समझ रहे हैं -
लँगड़ा - बहरा - गूँगा - काना ,
किस का खेत किस का फसल ;
गद्दी पे बैठ के -
कौन चुग रहा दाना ,
देश को बना दिया खोखला ;
फूट जाएगा दिवस तेरा फंडा ;
लड़खड़ा उठेगा तिरंगा झण्डा ,
कुछ नहीं बचा तो -
खाओं अब पाखंडा -,
सड़ा - गीला गोल अण्डा ,
बड़े बेशर्म -
बेच खाया लाज शर्म ;
माँ को बेच के उस का लाल ;
बना देश का बड़ा दलाल ।
रतन किर्तनीया
छत्तीसगढ़
जिला :- काँकेर
पखांजूर
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