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चक्रव्यूह

Raj Ashok 31 Jul 2024 कविताएँ हास्य-व्यंग चक्रव्यूह (एक निशस्त्र योद्धा) 36173 0 Hindi :: हिंदी

तरकश में मेरे बाण थे । 
             मुट्ठी में , मेरे प्राण थे।
शब्द , बंधे थे मेरे 
              परिस्थितियों में 
जब निकलें मेरे प्राण थे ।।
       अहंकार के मध, 
       में अंधेरा छाया था।
क्रोधित होकर  
           ताऊ आया था ।।
 कौन सा वो धर्म युद्ध था ।
      रण में हर योद्धाओं का 
मन विचलित था ।।
कहीं आज युद्ध हार न जाएं 
     सत्य बचाएं या 
          अपने प्राण बचाए 
जीत के लिए हम 
एक बच्चे के आगे क्यों 
व्यू रचना रचा ये।।
         असमंजस  में थे सारे । 
महाभारत के दिग्गज  योद्धा
   आज रण से हम क्या ले जाए 
युद्ध और नीति के सारे नियम भूले 
      आज कर्मवीर 
टूट पड़े एक नैह्ने से योद्धा पर 
 ये महाभारत ही सच है ।।
गर्भ में थे तब अभिमन्यु 
      जब अर्जुन व्यू रचना सिखा रहें थे ।।
सुभद्रा को नींद ना आई होती।
         तों अर्जुन अभिमन्यु के प्राण 
बचा रहे होते ।।
सीख,  क्या गुरु ज्ञान है ।
        भविष्य की चिंता में 
बैचैन है। माता -पिता 
        और मुठ्ठी में आज भी 
अभिमन्यु के प्राण है।

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