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भोर की वंदना

Ratan kirtaniya 07 Feb 2025 कविताएँ धार्मिक सुन्दर सुबह के संबंध में रचना है और सुन्दर सुबह में मंत्रमुग्ध होकर कवि सुन्दर सुबह की वंदना / आलती करती है। 16174 0 Hindi :: हिंदी

सजल सुजल सुप्रभात -
रवि से उज्ज्वल जगत ;
पुष्प खिले भू - आँचल में ,
भ्रमर गीत सुनाए बागाँचल में,
पूजा थाल सजाए थल में ,
रवि को अर्पण किया नल में,
तिमिर भागे नही तेरे बिना कभी -
जगो हे ! जग उद्य हुआ रवि ,
अब नहीं सोना हैं काम चोर;
जाग के देखो हो गया भोर,
रवि को पूछते जग - जीवन सभी ।

उद्य हो रे ! उद्य हो रे !
सजल - सुजल सुप्रभात ,
तिमिर को है मिटाना ,
खिले हृदय पुष्प से -
करूँ भोर की वंदना ‌,
हे ! रवि तिमिर मिटाके -
जग को उज्ज्वल देना ,
मेरे भारतवर्ष में ज्ञान देना ;
देश को महका देना ,
दे आशिष बाग को ,
बुझा दे अहंकार की आग को ।

सजल - सुजल सुप्रभात ,
मृदु - मृदु मलय मधुर पवन -
भोर से जग कीर्तन में मग्न जन जीवन ,
तेरे कीर्तन में लगा ए मन ,
नित्य नव पल्लव में -
खिले पुष्प लिये मुस्कान ,
भोर में भ्रमर गाए गान -
रवि देता सभी को ज्ञान ,
भोर की वंदना करें -
हे ! विहंगी जग में तू महान ।

कंचन बने जलधि -
प्रबल रवि की गति ;
हृदय को लुभाए -
खिले पंख का पंकज,
बैठी उस पे माँ शारदा -
माँ शारदा जग जननी कल्याणी ब्राह्मणी ,
हृदय पंकज से करूँ -
भोर वंदना - आरती ;
दे वरदान हे ! जग जननी ,
हो अभ्युदय परम - धर्म - चरम गति  ,
सजल - सुजल सुप्रभात ।

सजल - सुजल सुप्रभात ,
धर्म - कर्म प्रतिदिन -
क्षुधा हूँ मैं प्रतिदिन ;
क्षीण क्यों मैं शिति - दीन ,
तुहिन से कंचन बनी श्याम मलय घास ,
भू - धर की बुझाए प्यास ,
कण - कण में स्वर्ण बिछाए तूहिन,
हृदय पुष्प से करूँ -
भोर की वंदना - आरती ,
दे वरदान ! दे शक्ति -
न रूके देश में अभ्युदय की गति ।

कवि रतन कीर्तनिया

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