ATHARV YADAV 08 Oct 2024 कविताएँ दुःखद Rohityadavpoet 37073 0 Hindi :: हिंदी
अपना ही अपने पर बाण छोड़ता है,
अपना ही अपने को रोकता है,
अपना ही अपने का संघार करता है ,
और अपना ही अपने के लिए कफन लेकर आखिरी विदाई का इंतजाम करता है,
अपना ही अपनेका नाम बढ़ाना चाहता है,
और अपना ही अपनों को खाना चाहता है
कोई किसी का नहीं ढाल बनते देखा है,हाथों में मैंने इनके भाल देखा है ll
समझ कोई कुछ पता है नहीं,न बढ़ाने देते ना खुद बढ़ पातl हैं बस तमाशा बनकर रह जाते है,
जरूरी नहीं हर कोईआसमा की चादर को छू ले ,
यदि आप आसमान की चादर को छू ले तो अपना दायरा ना भूले क्योंकि समय का चक्का नियंत्रण चलता ही रहता है,
आने वाला कल आपके तप से बदलते ही रहता है ll
इतनी तमन्ना इतनी प्यासअफसोस ,
उसका कोई अस्तित्व नहीं,उसे पर मरते हो,
हमें क्यों ललकारते हो बढ़ जाऊं जिधर उधर ही विजय जाप करते ,
हरि हो साथ तो तन मन जमीन पैसा इज्जत सब नीलाम कर दू ,
हरि जानना तुम्हें मैं चाहता हूं वंचित हूं आपके मार्गदर्शन सेआपकी कृपा भीख चाहता हूं .....
एक नई दिशा और परमपिता परमेश्वर का आशीर्वाद चाहता हूं ll
____________"रोहित यादव"___________