Vipin Bansal 04 Jul 2023 कविताएँ समाजिक 28285 0 Hindi :: हिंदी
कविता = ( दिल्ली )
अंधी मूकबधिर अब हो गई दिल्ली !
दिल्ली का यह क्या हाल हो गया !!
असहाय, बेबस पिता लाचार हो गया !
पिता के ही सामने बेटा लाश हो गया !!
दो ही दिन बाद थी उसकी शादी !
खुशियों का वो घर श्मशान हो गया !!
सरेआम चाकुओं से गोद डाला !
दिल्ली शहर चलती फिरती लाश हो गया !!
यही है गर दिल वालों की दिल्ली !
फिर हिजड़ा नाम क्यों बदनाम हो गया !!
अंधी मूकबधिर अब हो गई दिल्ली !
दिल्ली का यह क्या हाल हो गया !!
वहशियों का दिल्ली में राज हो गया !
कभी श्रदा कभी साक्षी ये मंज़र आम हो गया !!
निर्भया के बाद भी न बदले हालात !
दिल्ली में पैदा रक्तबीज हो गया !!
इन्हीं खबरों से यहाँ बिकता है अख़बार !
दिल्ली में इसका अब बाज़ार हो गया !!
अख़बारों, खबरों के चैनलों में लगे चार चाँद !
यह अख़बारों, चैनलों का श्रृंगार हो गया !!
दिल वालों की है दिल्ली !
अब जुमलों में शुमार हो गया !!
अंधी मूकबधिर अब हो गई दिल्ली !
दिल्ली का यह क्या हाल हो गया !!
दिल से ख़त्म कानून का ख़ौफ़ हो गया !
क्या फांसी का फंदा इतना कमजोर हो गया !!
निर्भया इंसाफ से भी न सिखा सबक़ !
शायद यह इंसाफ़ गुजरे पल की बात हो गया !!
अब चौराहे पर ही टांग दो इनको !
सब्र का बाँध अब कमज़ोर हो गया !!
यही है भारत की राजधानी दिल्ली !
दिल्ली का चेहरा बेनक़ाब हो गया !!
पेरिस बनाने चले थे दिल्ली !
यह तो कातिलों का शहर हो गया !!
अंधी मूकबधिर अब हो गई दिल्ली !
दिल्ली का यह क्या हाल हो गया !!
विपिन बंसल