कवि सुनील नायक 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक नशा मुक्ति पर कविता 109894 0 Hindi :: हिंदी
मत पियो मोटियारा थे दारू।
थारी बोली नी थारे सारू।।
मत जाओ थे दारू र नैङा।
ईनै नी पिवै गधैङा।।
मत घाल तुं मुंडे माही जर्दो।
थुख - थूख थें सगळै घर नै भरदौ।।
सिगरेट सिळगार मत काढौ थें धुऔ।
ई सूं थांरी ज़िन्दगी रौ निकळ जावैला धूंऔ।
घौळ -घौळ मत पी तूं डौडा।
एक दिन जवाब दैदैसी थारा गौडा।।
मत पियो मोटीयारा थे बीड़ी।
थारी सगळी मांदी हौ जावैला पीङी।।
मत लै बैठ तूं हाथ माही हौकौ।
ई रुपाळी काया रौ बण जावैला खौखो।।
थां सूं इतरी सी है अरज म्हारी।
मत मौल लैवौ थै आ बीमारी।।
सगळौ डील थारौ धूजण लागियौ।
जद सूं तूं दारू पीवण लागियौ।।
कैई मण तूं आ गन्दगी खागियौ।
जिणरौ नाव गुटखौ लखायौ।।
जवानी माही बूढापौ निगै आवै।
अॆ तम्बाकू रा लखण लखावै।।
दारु पी'अर तूं पङियौ रैवै गळिया रै माही।
कुत्ता मूतै थारै मूंडै माही।।
- कवि सुनील कुमार नायक