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क्यों डरु मैं काल से

Rupesh Singh Lostom 30 Mar 2023 कविताएँ अन्य क्यों डरु मैं काल से 78199 0 Hindi :: हिंदी

बक्त हैं की रुकता हैं 
दुःख हैं की टलता नहीं
जख्म अभी तजा हैं 
एक समय है की 
बदलता नहीं 
सदियां गुजर गई 
कितनी घड़ियाँ गुजर गई 
न ये बदला मैं 
बस रहियाँ बलदल गई 
कितने रंग बिखर गए 
लोगों के गम बिछड़ गए 
कुछ अपने रूठ गए तो 
कुछ महफ़िल में छूट गए 
जो बचे थे बो 
मुख मोड़ गए 
और एक ये गम हैं
की अकेले छोड़ता ही नहीं  
अब समझ गया हु मैं 
कुछ बदल गया हु मैं 
अब नहीं मांगू तुझ से  
कुछ पल उधर के
मौत आणि है आजाये
क्यों डरु मैं काल से 
जब तक जिन्दा हैं जिंदगी 
जीऊंगा मैं शान से   


 

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