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संत और युवक की-अत्यंत दुर्लभ ज्ञान से भरी कहानी

मोती लाल साहु 07 Oct 2023 कहानियाँ अन्य संत, सद्गुरु, संत ज्ञान, स्वरूप का ज्ञान, आत्मज्ञान 50043 0 Hindi :: हिंदी

एक बार की बात है, किसी गांव में एक संत रहा करते थे स्वभाव से निर्मल सादा जीवन, एकांत में रहना उन्हें ज्यादा पसंद था। जो भी भिक्षाटन से मिलता, उसी से गुज़ारा चलता था।
गांव का एक युवक संत से काफी प्रभावित था। वह चाहता था कि संत के पास रहकर, कुछ ज्ञान-ध्यान की बात सीखे एक बार संत से अपनी इच्छा प्रकट किया। संत ने उससे कहा अभी तुम्हारी उम्र है, दुनिया देखने की कुछ कमाने-धमाने की दुनिया का भोग आनंद उठाने की। मेरे पास तो तुम्हें रुखा-सुखा खाने को मिलेगा, और तो कुछ है नहीं मेरे पास सो तुम दुखी हो जाएगा यह विचार त्याग दो।
काफी समझाने के उपरांत भी वह जाने को तैयार नहीं हुआ। तो संत ने उसे अपने पास रख लिया और कुछ सेवा समझा दी, अब वह खाना बनाता जगह इत्यादि साफ करता और रहने लगा।
काफी समय के उपरांत इच्छा जाहिर की मुझे भी कुछ ज्ञान-ध्यान दिजिए, संत ने कहा समय आने पर हम तुम्हें ज्ञान सिखाएंगे अभी सेवा करो।
कुछ समय बाद एक दिन संत ने कहा, हमें राज दरबार में जाना है जंगल का रास्ता है एक हफ्ते का समय लगेगा तुम भी साथ चलो। पर एक शर्त है इस एक हफ्ते के दरमियान तुम्हें चुप रहना है इस बात का ध्यान रहे।
युवक ने हामी भरी और दोनों साथ चल दिए, चलते-चलते रात हो गई कहीं आसरा चाहिए था रात गुजारने के लिए सो जंगल में एक झोपड़ी दिख गई। साधु संत देखकर दंपति काफ़ी खुश हुए यथा संभव अतिथि सत्कार किया और सेवा किया, दो दिन के पश्चात् उनसे विदा लेकर चलने को हुए तो संत ने अपने कमंडल से जल लेकर कुछ मंत्र पढ़कर गाय के ऊपर छिड़क दिया और गाय मर गई। इस कृत्य से दंपति काफी नाराज हुए, संत और उसके शिष्य को काफी फटकार लगाई और धक्के देकर निकाल दिया।
यह देखकर युवक आग बबूला हो गया पर चुप रहना था इसलिए चुप रहा, चलते-चलते जब राज दरबार में पहुंचे द्वारपाल के द्वारा राजा साहब को सूचना दिया गया की कोई साधु संत पधारे हैं। राजा साहब की आज्ञा हुई और अतिथि गृह में उन्हें ठहराया गया, राज दरबार में काफी आवा-भगत और शाही सत्कार नित्य चलता रहा। पर शिष्य का मन उखड़ा-उखड़ा था चिड़चिड़ा भी हो गया था, उसका भाव संत से छुपा हुआ नहीं था।
दो दिन गुजर जाने के बाद राजा साहब उनसे मिलने आए, हाल-चाल पूछा अतिथि सत्कार में कोई कमी हो तो बताएं यह कह कर राजा साहब जब जाने लगे। तब संत ने अपनी इच्छा जाहिर की राजमहल देखने की, राजा साहब ने आज्ञा दी रथ मंगवा दिया गाईड और दो सैनिक साथ लगा दिया।
राजमहल घूमते हुए उस जगह पहुंचे जहां कुछ निर्माण कार्य चल रहा था, उसके बगल में एक मकान था। अब संत ने अपने कमंडल से जल लेकर कुछ मंत्र पढ़ा और मकान पर छिड़क दिया जल छिड़कते ही मकान भर-भरा कर गिर गया, इस कृत्य की सूचना गई राजा साहब के पास। राजा साहब की आज्ञा से संत और उसके शिष्य को कोड़े से पीटा गया और भगा दिया गया।
यह सब झेलते हुए युवक से रहा नहीं गया पूछा आपने ऐसा क्यों किया, संत ने कहा तुम्हें चुप रहना है इस बात का ध्यान रहे। युवक चिढ़ गया और गुस्से में आकर संत को पागल बदमाश पाखंडी तक कहने लगा, बोला मुझे बताओ जंगल के दंपति का गाय को क्यों मारा। जिन्होंने तन-मन से सेवा किया, राजा साहब ने इतना स्वागत किया मान सम्मान दिया फिर उनका मकान क्यों गिराया। मुझे इसका जवाब दो और अब मुझे नहीं रहना तुम्हारा ज्ञान नहीं चाहिए।
संत ने कहा ठीक है एक बार सोच लो तुम्हारे लिए मौका है, क्योंकि तुमने हमारी सेवा की है। इस बात पर युवक और ज्यादा चिढ़ गया, तब संत ने कहा तो सुनो लेकिन सुनने के पश्चात् तुम एक मिनट के लिए भी यहां पर नहीं रूक पाएगा  युवक बोला ठीक है।
प्रथम जवाब- संत ने कहा-उस दंपति में तीन ही लोग थे पति-पत्नी एक पुत्र और पुत्र का उस दिन मृत्यु था, जिसे गाय को ट्रांसफर कर दिया गाय अकेली थी उसका कोई नहीं था।
दूसरा जवाब- मकान के नीचे अकूत सोने का भंडार है जब मलवा हटाया जाएगा राजा साहब को वह उपलब्ध हो जाएगा।
संत ने कहा- अब तुम जा सकते हो यह तुम्हारी परीक्षा थी तुम ज्ञान के काबिल नहीं हो, यह मेरे द्वारा रची गई माया थी तुम समझ नहीं पाए इसलिए तुम ज्ञान भी नहीं समझ पाओगे।
-मोती 

शिक्षा- गुरु आज्ञा सर्वोपरि!

"जयों मिलें संत सो बड़भागी,
ज्ञान दें दुर्लभ सो-ए-शिरोमणि"...!!!!
-मोती

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