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सच्ची दोस्ती

Afsana wahid (moin raza ghosi) 19 Jun 2025 कहानियाँ प्यार-महोब्बत Afsana wahid, poetry, artikal, story,shairy 12869 0 Hindi :: हिंदी

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"वो जो मेरी चुप्पियों को पढ़ लेता था"

ज़मान और रिज़वान की दोस्ती की शुरुआत बहुत आम सी थी।
एक कॉलेज कैंटीन, एक टेबल, और एक ही ऑर्डर — समोसा और कटिंग चाय।
ज़मान ने पहली बार रिज़वान को देखा था जब वो अपनी किताबें गिराकर बेहद परेशान दिख रही थी, और बाकी लोग सिर्फ हँस रहे थे।
बस रिज़वान ही था, जिसने बिना कुछ कहे वो किताबें उठा दी थीं।

“शुक्रिया…” ज़मान ने झिझकते हुए कहा।

“दोस्त बनने का भी शुक्रिया लोग कहते हैं क्या?”
रिज़वान ने मुस्कुरा कर जवाब दिया था।

और बस, वहीं से एक दोस्ती ने जन्म लिया।


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ज़मान, किताबों में डूबी रहने वाली, सीधी-सादी, मगर दिल से गहरी लड़की थी।
उसे चुप रहना पसंद था — लोगों की भीड़ में गुम रहना, खिड़की से आसमान देखना, और सर्द हवाओं में गरम चाय पीना।

रिज़वान उसके बिल्कुल उलट था —
हर जगह हँसता, सबका चहेता, और हर फेस्टिवल में सबसे आगे।

लेकिन फिर भी, ज़मान की खामोशी और रिज़वान की शरारतें जैसे एक-दूसरे को पूरा कर रही थीं।

कॉलेज के हर कोने में लोग उन्हें साथ देखते,
और अक्सर पूछते — "तुम दोनों का कुछ चल रहा है?"

ज़मान हँस देती, रिज़वान चुप हो जाता।

उनके बीच का रिश्ता नाम से कहीं ज़्यादा गहरा था।


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एक बार ज़मान का रिजल्ट बहुत खराब आया।

वो लाइब्रेरी के कोने में बैठी थी — आँखें नम, होंठ सिले हुए।

कोई उसके पास नहीं आया —
बस रिज़वान आया।

कुछ नहीं पूछा,
बस उसके पास बैठ गया।

दोनों चुप थे।

"मैं फ़ेल हो गई, रिज़वान..."

"तो क्या हुआ?"
उसने कंधे उचका दिए।

"अब तुम टॉपर नहीं रही, तो क्या मैं दोस्त नहीं रहूँगा?"

ज़मान पहली बार उस दिन खुलकर हँसी थी।


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समय बीतता गया। कॉलेज का आखिरी साल आ गया।

अब ज़मान के घरवाले उसकी शादी की बात कर रहे थे।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या चाहती है।

रिज़वान ने एक दिन कहा —

"अगर तुझे कभी किसी फैसले में हिम्मत ना हो… तो बस एक कॉल कर देना… मैं तेरे लिए लड़ जाऊँगा ज़मान… जैसे तू मेरी लड़ाई में हमेशा खड़ी रही।"


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लेकिन ज़िंदगी हर बार इतनी मोहलत नहीं देती।

कॉलेज खत्म हुआ।
रिज़वान अपने शहर चला गया, ज़मान अपने।

फिर फोन, मैसेज, चैट —
धीरे-धीरे सब कम होने लगा।

एक साल गुज़र गया।


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फिर एक दिन, ज़मान को एक खबर मिली।

"रिज़वान की एक्सीडेंट में मौत हो गई है..."

उसने जैसे सुना ही नहीं।

उसके अंदर कुछ टूट गया था —
जैसे किसी ने उसके बचपन की वो गली जला दी हो,
जहाँ वो चुपचाप जाया करती थी।


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अब पांच साल हो गए थे।

ज़मान एक स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी।

कभी-कभी किसी बच्चे की शरारत, या किसी का नाम "रिज़वान" सुनकर
वो अनजाने में मुस्कुरा देती थी।

एक दिन वो स्कूल के स्टाफ रूम में बैठी थी।

टेबल पर चाय रखी गई थी — साथ में एक समोसा।

किसी ने पीछे से धीरे से कहा —

"समोसा और कटिंग चाय अब भी पसंद है?"

उसकी साँस अटक गई।

वो पलटकर देखती है — और सामने रिज़वान खड़ा था।

“त... तुम?” उसकी आवाज़ कांप गई।

"मैं नहीं मरा था ज़मान… मेरे पेरेंट्स ने दुनिया से मुँह मोड़ लिया था, और मुझे लगा तू भी..."

ज़मान अब भी चुप थी।

फिर वो धीरे से बोली —

"कितनी बार उस लाइब्रेरी के कोने में तुझे ढूँढा…"

"मैं भी हर चाय की दुकान पर तेरा इंतज़ार करता रहा…"
रिज़वान की आँखें भी भीग गई थीं।


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वो दोनों वहीं, स्कूल की सीढ़ियों पर बैठ गए।

अब कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी।

वो दोस्ती — जो वक़्त और फासले से भी नहीं टूटी —
आज फिर वहीं थी, जैसे पहली बार कैंटीन में थी।


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कभी-कभी दोस्ती मोहब्बत से भी ज़्यादा मुकम्मल होती है।
क्योंकि वो लौट सकती है…
फिर से ज़िंदा हो सकती है…
बिना किसी शर्त के।


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