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ख्वाब के पार : हक़ीक़त

Nihal singh 25 Dec 2025 कहानियाँ समाजिक #छात्र_जीवन #शिक्षा #दोस्ती #प्रेरक_कहानी #विचारप्रधान 14946 2 5 Hindi :: हिंदी

ख्वाब के पार : हक़ीक़त
(भाग – 1)

विकल्प अभी स्कूल में पढ़ता है।
उसे पढ़ाई से कोई परहेज़ नहीं,
पर उसकी रुचि का केंद्र एक ही विषय है— हिन्दी।

बाकी विषयों से वह भागता नहीं,
बस उनसे जुड़ नहीं पाता।
लोग इसे लापरवाही समझते हैं,
जबकि सच्चाई इससे कहीं गहरी है।

उसकी इस उलझन के पीछे एक कहानी है—
जो वह हर किसी से नहीं,
सिर्फ़ अपने दोस्त आदि से साझा करता है।

आदि और विकल्प एक ही कक्षा में नहीं पढ़ते,
लेकिन दोस्ती किसी कक्षा की मोहताज नहीं होती।
वे एक-दूसरे को सुनते हैं,
और बिना कहे भी समझ लेते हैं।

एक दिन विज्ञान की कक्षा में,
विकल्प ने एक सवाल पूछ लिया।
सवाल का जवाब नहीं मिला,
डाँट ज़रूर मिल गई।

“किताब में जो लिखा है, वही सही है।
ज़्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं।”

कक्षा के बाहर खड़ा आदि
यह सब चुपचाप देख रहा था।

स्कूल से लौटते समय,
आदि ने कहा—

“क्या हुआ विकल्प?
तू कोशिश करता है,
फिर भी पढ़ाई में मन क्यों नहीं लगता?
अगर कोई बात है,
तो मुझे बता।”

विकल्प कुछ देर खामोश रहा।
फिर बोला—

“आदि, बात डर या नापसंद की नहीं है।
बात उससे भी आगे की है,
जहाँ शब्द कम पड़ जाते हैं।”

आदि रुक गया।

“फिर ऐसा क्या है
जो तुम्हें भीतर से परेशान करता है?”

विकल्प ने उसकी ओर देखा और पूछा—

“क्या तुमने कभी
ख्वाबों के पार की हक़ीक़त देखी है?”

आदि चौंका।
“यह कैसा सवाल है?”

विकल्प ने कहा—

“मैंने एक ख्वाब देखा था।
और जब उसकी हक़ीक़त समझी,
तब से उलझन बढ़ती चली गई।
हिन्दी के अलावा
कोई भी विषय
मुझे उस ख्वाब को बुनने नहीं देता।”

आदि बोला—
“तो बताओ,
वो ख्वाब क्या था?”

विकल्प ने कहा—

“मैंने देखा,
मैं एक गहरी खाई में गिरा हूँ।
चारों तरफ वही लोग खड़े हैं
जो हमें पढ़ाते हैं।
मैं चिल्लाता हूँ—
‘बचाओ…’

सब कोशिश करते हैं,
लेकिन कोई मुझे बाहर नहीं निकाल पाता।

फिर हिन्दी के अध्यापक आगे आते हैं।
वे कुछ पंक्तियाँ पढ़ते हैं—
शायद कविता थी।

उन शब्दों से
मेरी हिम्मत लौट आती है।
मैं हाथ-पाँव चलाता हूँ
और खुद को बाहर खींच लेता हूँ।”

आदि मुस्करा दिया।

“अरे,
ये तो सिर्फ़ सपना था।”

विकल्प भी मुस्कराया,
पर उसकी आवाज़ गंभीर थी—

“जो तुम्हें सपना लगता है,
वही मेरी हक़ीक़त है।
और यही फर्क
मैं तुम्हें हर विषय के ज़रिये समझाऊँगा।”

आदि बोला—
“तो शुरू करो।”

विकल्प ने कहा—

“विज्ञान हमें सिखाता है
कि ‘क्यों’ पूछा जाए।
लेकिन जब स्कूल में
हम ‘क्यों’ पूछते हैं,
तो कहा जाता है—
‘जो लिखा है, वही मानो।’

जब सवाल किताब से आगे जाता है,
तो सवाल करने वाला
गलत ठहरा दिया जाता है।

अब समझे?
ख्वाब में जब मैं मदद माँग रहा था,
तो उनका हाथ
मुझ तक क्यों नहीं पहुँच पाया।”

आदि कुछ सोचने लगा।

“हाँ…
अब बात समझ में आने लगी है।
लेकिन हर गलती
किसी एक की नहीं होती।”

विकल्प ने पूछा—
“क्या मतलब?”

आदि ने हल्की हँसी के साथ कहा—

“कभी-कभी कुर्सियाँ
काबिलियत से नहीं,
व्यवस्था से मिलती हैं।
और जहाँ सवाल असुविधा बन जाए,
वहाँ चुप्पी को अनुशासन कहा जाता है।”

दोनों कुछ पल हँसे,
कुछ पल चुप रहे।

फिर आदि बोला—

“इस विषय की बात तो समझ ली,
बाकी विषयों का क्या?”

तभी आदि का घर आ गया।
वह बोला—

“चल,
शाम को
तेरे ख्वाब के आगे की हक़ीक़त समझेंगे।”

इतना कहकर
दोनों दोस्त
अपने-अपने रास्ते चल पड़े।

(क्रमशः)

Comments & Reviews

Rekha
Rekha शानदार कहानी

4 months ago

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Vinod kumar
Vinod kumar Bhut mast

4 months ago

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