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कल्याणी (भाग प्रथम)

AJAY ANAND 23 Jun 2024 कहानियाँ प्यार-महोब्बत प्रेम, रोमांस, रोमांटिक, कॉमेडी, एहसास 37081 0 Hindi :: हिंदी

कल्याणी एक प्राइवेट टीचर। एक मिडिल फेमिली से होते हुए भी कभी ऐसा गलत काम नहीं किया जो समाज उसे दोषी ठहरा सकें। अपने काम से मतलब रखने वाली एक होनहार लड़की परिवार की जरूरत और जिम्मेदारी को बखूबी निभाना जानती है। एक भाई और एक बहन से बड़ी होने का फर्ज पूरा करने में सहजता महसूस करती है। 
दवाईयां का थैला बेड पर लेटी हुई मां के बगल में रखते हुए कहा - लो , रख लो..!! दस दिनों की दवाई है। डाक्टर साहब बोले है सभी दवाईयां खाने के बाद तुम ठीक हो जाओगी। 
तब तक उसकी मां रोहिणी की आंखें खुल जाती है जो अभी अभी सोने का ही पर्यंत कर रही थी। कल्याणी आकर पास बैठ गई । रोहिणी, कल्याणी के हाथ पकड़ लेती है। वह सब कुछ सुन चुकी थी।

तुम नहीं होती तो पता नहीं शायद मैं मर गई होती, उसकी मां कल्याणी की ओर देखते हुए बोलती है।
आ .. जरा पास आकर बैठ, सुबह गई हुई अभी वापस आई हो। भूख तो लग गई होगी क्योंकि रोहिणी जानती थी कि यह फिजूलखर्ची नहीं करती है और बाहर के खाने में इंटरेस्ट भी नहीं है।

ऐसा क्यों कह रही हो, इतनी जल्दी तुम्हें मैं मरने नहीं देने वाली। तुम ही तो हम लोगों की उम्मीद हो और सहारा हो। पापा ने तो हम लोगों को त्याग ही दिया है। कल्याणी मां के सिर को चूमते हुए कहा।
पापा भी तुम्हारे अच्छे थे और अब भी है। उन्हें क्यों दोष देती हो तुम। वे तो अपना दिमागी संतुलन खो चुके हैं। देखना जब उन्हें सबकुछ याद आ जाएगा तो तुम लोगों से कितना प्यार करेंगे। पहले की तरह ही। परिस्थितियां एक समान नहीं होती ना...! कल अच्छे थे तो आज खराब, फिर आने वाले समय में अच्छे हो जाएंगे। ना हमने और ना ही तुम्हारे पापा ने किसी को कष्ट दिया है। हमारे दिन भी अच्छे आएंगे।
तुम तो उम्मीद लगाए बैठी हो मां...! वो ऊपर वाले पर , जो सिर्फ उसी कि सुनते हैं जो बुरे लोग होते हैं, बदमाशों की और गुन्डों की।
अरे ऐसा नहीं कहते। ईश्वर हमारी परिक्षा ले रहे हैं। सब्र और धीरज का..! उम्मीद कभी मत खोना और बुरे लोगों से भी अच्छे से बात करना .. ये बात तुम्हें पापा ने समझाई है ना...!!
कल्याणी उसकी बातों में अपने सिर को हिलाकर मुस्कुरा दिया।
दरवाजे की जोरदार आवाज ने दोनों को चोंका दिया था और किसी की गिरने की आवाज ने तो उसे बिस्तर पर से उठने के लिए मजबूर कर ही दिया था।
कल्याणी समझ चुकी थी, उसने अपनी मां की ओर देखते हुए कहा - और कितनी प्रतिक्षा करनी है, वो भी बता दो मां। भगवान और हमारी कितनी परीक्षा लेना चाहते हैं।
और कितनी.....!!!
अब हमसे सब्र नहीं होता। तुम्हारी तरह मेरा दिल नहीं है।
वो दोनों उठकर बाहर निकलते हुए दरवाजे के पास पहुंचती है।
लो सम्भाल अपने बाप को, मेरी औरत की ओर देखकर गंदी - गंदी हरकतें कर रहा था। वह तो मैं तुम लोगों की इज्जत करता हूं वरना इसे पुलिस के हवाले कर देता। 
पता नहीं तुम लोग कैसे झेल लेते हो इस आदमी को...!! मेरा बाप रहता तो बीच चौराहे पर उल्टा लटका देता। पागलपन की भी कोई हद होती है। इसने तो सारी हदें ही पार कर दी है।
वह शरीफ आदमी कहता हुआ वहां से चला गया लेकिन कल्याणी को दर्द देते गया जो हर रोज उसे सुनने को मिलता रहता था।
देख क्या रही है, उठा अपने पिता को....! रोहिणी अपने पति को हाथ लगाते हुए कहा और दोनों उसे उठाकर दिवाल के बगल बिछे हुए चादर पर लिटा दिया। वह अब भी नशे में गालियों निकाल रहा था।
उसे बाहर ही क्यों नहीं छोर दिया। कम-से-कम भेड़िए का तो पेट भर जाता। अब इस आदमी को देखते ही हमें घिन होने लगता है। ऐसे बाप का मर जाना ही अच्छा है। कल्याणी गुस्से से कहा।
ऐसा नहीं बोलते, वो तुम्हारे पिता है। पिता के बारे में कोई ऐसा भी बोलते हैं क्या?? मां उसे समझाते हुए कहा।
तुम हमेशा यही बोलकर हमें चुप करा देती हो। आखिर कब तक उसे हम अपने पास रहने दें मां.. तुम ही बताओ। कमाते कुछ नहीं हैं .. मेरे पैसे से ही शराब पी जाते हैं। मेरी आमदनी भी तो उतनी नहीं है जो सबक भरण-पोषण कर सकूं। ये भी कोई वक्त है पीने और पिलाने की। नशा उतरा नहीं कि फिर चल पड़े अड्डे पर।
रोहिणी दवाई के थैले की ओर देखा और उसने अफसोस जताते हुए कहा - समझतीं हूं मैं , तुम कितनी बड़ी जिम्मेदारी लेकर गुजर रही हो। 
अब छोड़ो भी मां.....! रहने भी दो। बहुत हो चुका, अब नहीं। देख लेना एक दिन मैं ही घर छोड़कर भाग जाउंगी। रोज - रोज के झंझटों से तो बची रहुंगी।

आगे क्या होगा.. दुसरी कड़ी में पढ़ेंगे....

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