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गरीबी

Shubham Kumar 30 Mar 2023 कहानियाँ दुःखद गरीबी 86939 0 Hindi :: हिंदी

यह घटना लगभग, 2007 की है, तब मैं छोटा था,, ए घटना मेरे घर के बगल की है, मैं इसे अब तक भी भुला नहीं पाया हूं, वह पार्वती चाची_ उनकी तीन बेटियां थी, उनमें से, एक लड़की का वह छोटे में ही, देहांत हो चुकी थी, दो बेटियां  ही बची थी, उनका कोई बेटा नहीं था, बड़ी का नाम ममता_ छोटी का नाम रेशमा था_ चाचा जी बीमार रहते थे, एक बिस्तर पर पड़े रहते थे, पूरे शरीर में, लगभग लकवा का शिकार हो चुके थे, पार्वती चाची_ का घर एक कच्ची दीवाल का, उस पर कभी-कभी प्लास्टिक देकर, वह लोग रहते थे, शाम के वक्त_  दिए जलाते वक्त,  तेल कभी किसी दूसरे के घर से मांगना होता था, सरकार से महीने में 2 लीटर  तेल मिलता था, जो पर्याप्त नहीं था, और हमारे बिहार में, उस समय बेरोजगारी भी, इससे कहीं ज्यादा था, कभी-कभी तो ठेकेदार, कुछ ऐसे होते थे, जो काम करा कर भी, पैसे हड़प लेते थे, कुछ कुछ पैसे देकर ही, काम चला लेते थे, लोग जाने-माने बड़े-बड़े लोग थे, हम गरीबों  उनका कर भी क्या सकते थे, कभी खेतों में  काम होते , तो पार्वती चाची सारा दिन काम करके, जो  मजदूरी होता था, उसी से  खुराक चलता था, चिड़िया जैसा हाल था, कैसे शाम को घर में, चिड़िया दाना नहीं ले जाए, तो उनका परिवार भूखे रहेंगे, ऐसा जीवन था, और चाचा जी _ को सुबह ही भूख लग जाती थी,  खाना के लिए ऐसे चिल्लाते थे रोते थे_ हे बाप, हे मैया, कोई हमारा खाना खिला दे, अब प्राण जात _ कोई पानी पिला दे बप्पा_ अब  प्राण टूटे, कभी-कभी मुझे  सुनकर दया आ जाती थी_ अगर मेरे घर में खाना_ बना रहता तो_ मैं उनके लिए दौड़ कर ले जाता था, जब वह खाना देखते थे, तो उस पर किसी राक्षस की तरह,  टूट पड़ते थे, ठीक से हाथ भी नहीं धोते थे,  उनको ऐसा लगता था, जैसे उनके पास  से खाना , कोई छीन लेगा,  जब हम मछली मिल जाते, तो उनके लिए किसी पर्व से,  कम नहीं होता, एक खासियत, उनके पास और थी,  वह जब भी खाना देखते, तब  भूख लग जाती थी_ पार्वती चाची को, उनका रोना चिल्लाना, अच्छा नहीं लगता था, पार्वती चाची, प्रतिदिन, कभी  इसके घर से कभी उसके घर से_  आनाज  उधार लेकर,  खाना  बनाती, और आधा से अधिक, भोजन तो चाचा  खा लेते थे, पार्वती चाची के पास, कपड़ा नाम  मात्र का, कुछ फटे पुराने, साड़ियां होती थी, गांव वाले, पुराने तराने_ साड़ियां जब उन्हें  देती, तो उसे पहन कर खुश रहती थी,  1 दिन चाची जी_ रोज की तरह, गांव में, अपनी मजदूरी, मांग करने  गई, कुत्ते को शायद, उनका पहनावा अच्छा ना लगा, वह कुत्ते ने, उन्हें काटकर,  लहूलुहान कर दिया, चाची रोती बिलखती, घर को  आई थी, और उनका स्वास्थ्य इतना खराब हो गया, कि वह मरने की अवस्था में  हो चुकी थी, दो बेटियां छोटी छोटी थी, चाचा जी रोने के सिवा, कर भी क्या सकते थे, उन्हें कभी भूख लग जाता,  लोग खाना देते थे, आसपास के लोग मिलकर, कुछ पैसा डॉक्टर को दिए, लेकिन डॉक्टर  उनका  जीवन बचा नहीं पाए,, वह चाची, राम को प्यारी हो गई, तो बेटियां, इसके उसके घर में काम करते, और चाचा जी का, वही खाने के लिए रोना, एक दिन मेरे घर में भी, कोई आदमी ना था, हम सब अपने अपने खेतों में, काम करने के लिए चले गए थे,  इधर चाचा को, खाना ना मिलने की वजह से, मौत हो चुकी थी, मैं सोचता हूं कि_ यह दुख भरी जीवन से, उन दोनों का मरना अच्छा था,__ मैं भगवान से उनकी आत्मा के शांति के लिए, ईश्वर से प्रार्थना करता हूं, आज भी हमारे गांव में, ऐसी गरीबी देखने को मिलती है, क्योंकि गांव में लोग अधिकतर, बेरोजगार बैठे रहते हैं, उनमें से अगर कोई, 10 दिन का भी  कार्य  मिल जाता है तो, वह किसी दीपावली से कम नहीं, और ऐसे कितने ठेकेदार, भी भरे पड़े हैं, जो काम करा कर भी पैसे नहीं देते,, गांव वाले लोग करे तो क्या करें_ गरीबी  बढ़ती जाती है, अब कर्जा तो मानो, पूछो ही मत, कभी-कभी तो, लोग उनके घरों पर भी, अधिकार जमा लेते हैं, और उन्हें बेइज्जत  भी करते हैं, क्या बताऊं, गरीबी की कोई, व्याख्या नहीं कर सकता,  उससे दर्दनाक, कोई पीड़ा नहीं होती,  बेरोजगारी से बड़ा, कोई अभिशाप नहीं होता, कर्ज से बड़ा_ कोई भी  विपदा नहीं होता,

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