🙏 धरत्ती मां 👏 - Amit Kumar prasad

🙏 धरत्ती मां 👏     Amit Kumar prasad     कविताएँ     देश-प्रेम     2022-10-06 05:41:23     It is glory of sense and a knowledge is prepared one type of seed in the field of sense. When he goes to drop in mind of People than, It emerges to prepare Sensority to out come Development of Land. And during this poem has been described that.. A land is even to the subject of worship and how land in any time to be Juridiction Land & Every one know a very important identification of a person is that, He happens first Citizens of Nation. And their Nationality happens to him first religion. And in the worship of Nationality says to the Land of Nation Mother Land. In this poem during says the work of Land according to ancient age to meddle with scholars invention's openion with survice how Land prepared a Mother Land. And this poem in knowledge to Science of inscription has been done. And Gravitational Force, Frictional force is sign of Land duty for a person. Now, Jai Hind and Wining world to humanism. To be Victory🙏     72643           

🙏 धरत्ती मां 👏

घर्षण और गुरूत्वाकर्षण विद्या, 
का न्युटन ने विज्ञान दिया! 
घुर्णन और परिक्रमण विद्या, 
का अरस्त्तु ने परमाण दिया!! 
                        दिन - रात्त है होत्ता दैनिक
गत्ती से, 
                        वार्षिक गत्ती से ऋतु
परिवर्त्तन होत्ती है! 
                        सह धुप - घाम, पानी पत्थर, 
                        यह  बिज़ स्नेह का बोत्ती है!! 
थामे है रखी ये गोद में अपनी, 
ज़ीव जगत्त और वनस्पत्ती! 
देत्ती हैं छाह, जलधार, 
गोद में थाम रखें मानवत्ता को!! 
                          हर फ़र्ज चुका अपने ये स्नेह
का, 
                          धरत्ती मात्ता कहलात्ती है! 
                          और धरा के रक्क्षक शुरवीर के, 
                          श्रद्धा से पुज़ी ज़ात्ती
है!! 
न भेद रखों इनके कण से,
इसपे हैं वर्ण पर त्ताज़ रचा! 
ज़ो करा भेद फ़र्ज - निज़ इच्छा पर, 
वो निज़ के विरूद्ध आघाज़ रचा!! 
                           ये बन भारत्त ये बन के हिन्द, 
                           सबके दु: खड़े हर लेत्ती है! 
                           ये प्राचीन युग का ईत्तीहास
रचा,
                           कि धरत्ती श्राप भी देत्ती
है!! 
निज़ कि खात्तीर हम याद करे, 
ईश्वर को पुष्प चढ़ात्ते हैं! 
जब निज़ विकाश पुर्ण होत्ता, 
निज़ चाह में दैव भुलात्तें  हैं!! 
                           थे दानवीर ने पुन्य किए, 
                           पर धर्म अलग हो खड़े अधर्म! 
                           सब कुछ था किया अर्पण धर्म को,

                           पर वचन कि खात्तीर दुर्योधन
संग!! 
अन्यायी से है महा गलत्त, 
चुप रहना है ईक न्यायी का! 
धरत्ती विकाश है धर्म, सत्य, 
और न्यायों को हैं सींचीं वशुन्धरा!! 
                             अन्त समय सब कुछ भुले, 
                             वशुधा ने पहिया दबा लियें!
                             था कर्ज धरा का महा अचल, 
                             ज़ीस फ़र्ज से वंचीत्त कर्ण
रहें!! 
वशुधा ऊपज़ाए धर्म कणों में, 
धर्मी को संत्ताप भी देत्ती है! 
पर विमुख धरा कर्मों के वीर को, 
धरत्ती श्राप भी देत्ती है!! 
                              हर लेत्ती बन हर - हर गंगें,
                              धरत्ती कि धरा को धार लिया! 
                              घर्षण और गुरूत्वाकर्षण
विद्या, 
                              का न्युटन ने विज्ञान दिया! 
ये ईत्तीहास से लेकर भु गोल पृष्ट पर, 
सर्व सत्य आदर्णिय है! 
ये है सुज़ला और है सुफ़ला, 
और यही मां धरणी, भरणी है!! 
                   इस धरा पे आ ज्ञानी, महा ज्ञानी,
                   विज्ञान, ज्ञान सम्मान दिया! 
                   घुर्णन और परिक्रमण विद्या, 
                   का अरस्त्तु ने परमाण दिया!! 
Poet   :  Amit Kumar Prasad
कवी    :  अमित्त कुमार प्रशाद... ✍️

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