अलफ़ाज़-ए-धरा - Trishika Srivastava

अलफ़ाज़-ए-धरा     Trishika Srivastava     शायरी     प्यार-महोब्बत     2022-08-14 17:03:18     दिल में इस तरह तिरी याद आई / ज़िन्दगी जीने का हुनर / कई ऐसे राज़ हैं / बहुत दिन हो गए / ख़ाली पड़े रहे     18371           

अलफ़ाज़-ए-धरा

दिल में इस तरह तिरी याद आई
सूने सहरा में  गोया  बहार  आई
कागज़ पे बयां कैसे करूँ ग़म-ए-हिज्र 
मिरी कलम में नहीं है इतनी रोशनई

— त्रिशिका श्रीवास्तव ‘धरा’

ज़िन्दगी जीने का हुनर 
नन्हे पंछीयों से सीखिए
इक नशेमन टूट भी जाए
तो दूजा बना लीजिए

— त्रिशिका श्रीवास्तव ‘धरा’.

कई ऐसे राज़ हैं 
जिन पे पर्दा डाल रखा है
तिरा दिया हर ग़म मैंने 
सीने में पाल रखा है

— त्रिशिका श्रीवास्तव ‘धरा’

बहुत दिन हो गए 
तुम्हारी ख़बर नहीं आई
तुम्हारी लिखी कोई चिठ्ठी 
मेरे घर नहीं आई

— त्रिशिका श्रीवास्तव ‘धरा’

ख़ाली पड़े रहे 
क़िताब-ए-ज़िन्दगी के पन्ने
कोई नहीं आया
इन पर कहानी लिखने

— त्रिशिका श्रीवास्तव ‘धरा’

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