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खामोश मंजिल

Kishor Kumar Bhardwaj 29 Dec 2025 कविताएँ अन्य खामोश मंजिल 6452 0 Hindi :: हिंदी

#खामोश_मंजिल
ऊँचाई पर पहुँचकर शायद
हवा पतली हो जाती है,
साँसें चलती हैं
पर अपनापन कम हो जाता है।
नीचे भीड़ थी, शोर था,
पर अपनो की एक आवाज़ थी,
ऊपर सन्नाटा है,
और सन्नाटे में मैं ही नहीं हूँ।
कुछ पाने की दौड़ में
कदम तेज़ होते गए,
पीछे छूटते रिश्ते
आवाज़ देते रहे-
पर मंज़िल की चमक
आँखों को अंधा करती गई।
सुकून भारी बोझ लगा,
और अकेलापन
सफलता का पर्याय बन गया।
जब पलटकर देखा,
तो रास्ते थे
पर साथ नहीं,
यादें थीं
पर वो लोग नहीं
जिनसे जीवन में खुशी थी।
अब समझ आता है-
हर ऊँचाई जीत नहीं होती,
कुछ मंज़िलें
छद्म होती हैं,
जो हमें वहाँ पहुँचा देती हैं
जहाँ सब कुछ होता है,
बस “अपने” नहीं होते।

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