संदीप कुमार सिंह 08 Aug 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 23850 0 Hindi :: हिंदी
नयी हसरतों के दीये जल रहें हैं, यौवन का अभी समय है निर्माण कर ले। संगीत के धुन सा धड़कन भी धड़के, सोला सा रक्त भी अनवरत भड़के। नैनों में चाहतों की दौड़ भरि है। एक प्रतिस्पर्धा का क्यों न सृजन कर दें। हमारी खुशी को देखकर दुनिया ललचाए, औरों के मन में भी खुशियों की चाहत जगे। मस्तिष्क में विचारों की सैलाब बह रही हो, और वो भी ऐसे विचार जो सबका भला करे। तो क्यों न ऐसे विचारों को प्रकाशित करें, ताकि अपना प्यारा जग भी प्रकाशित हो। एक ऐसे दीयों का समूह बनाएं, जिससे समाज में नित ही प्रसन्नता का माहौल रहे। जीवन में हमें वो सब मिले जितने साधन यहां मौजुद है, फिर जिन्दगी ऐसी हमें बार_बार मिले। चाँद पर भी अब हम सबको पहुंचना है, धड़ा से लेकर फलक तक पर भी छाना है। ढेरों विरासत छोड़ कर हम जायेंगे, आने वाले अपने बच्चों को सौगातों की लड़ी दे जायेंगे। मलाल लेकर बैठने से क्या फायदा? जो हुआ भूल कर नव सृजन में लग जायेंगे। निर्माण और ध्वस्त तो प्रकृति का नियम ही है, यह सोचकर कदम निरंतर बढ़ाते ही रहना है। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️ जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....