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Anjani pandey (sahab)
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Anjani pandey (sahab)
Anjani pandey (sahab)
Anjani pandey (sahab)
@ anjani-pandey
, Uttar Pradesh
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घर से दूर शहर में
ढलते ढलते साम की कदर हमसे पूछिए इक रात नही हर रात का सफर हमसे पूछिए मुद्दतो में पहुंचे है एक घर में कहीं अपने घर से दूरी
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सरकारी नौकरी(कलेक्टरी)
अंधेरे में सरकारी नौकरी की चाहत वाला जितने अंधेरे थे जहेन में सब गरीबी के बने बनाए थे चाहत थी सरकारी नौकरी की सभी
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कहानी का टुकड़ा
अजब सी कविता का एक हिस्सा हू ना जीवन में रोज का एक किस्सा हूं ना पढूं किताब कौन सी जो ये सीख मिले कितना पन्ना पलटू मैं, कितनी ला�
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गांव की हवा
हम जिंदगी नही साहब, बस जी रहे है गांव में मिलता था पानी शुद्ध पीने को, सहर में फिल्टर वाला पी रहे है कभी जब जी ऊबता था दोस्तो से म
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घना अंधेरा और यूपीएससी अकांछी
छोटी सी आशा और घना अंधेरा सिर्फ साथ मेरे एक जुगनू लंबी रात के बाद सवेरा कब तलक जला के रखूं रुई की मशाल को फिर से छाए�
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आधुनिक मानव
हम लोहा है हमे गोली जैसे चलने दो हम स्थूल विचारो के गट्ठर हैं आदम के सांचे में ढलने दो । हम भी मनु की संतान ह�
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गांव की विपत्ति
सुबह की रोशनी जैसे मिमियाती बकरी थोडा सा धूप हुई जैसे कन खडे खरगोश लू सी बहती गरम दुपहरी जैसे चतुर लोमड़ी हुई सांझ की होई गय बव�
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वन वाटिका
"वन-वाटिका" हरे भरे उपवनो में पंछी सुर में गाते है प्यारे प्यारे फूल खिले है जंगल में मोहन गैया चराते है। जब बांसुरी बजा�
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सच्चा आशिक
यूं अश्क बहाने लग जाएं हम भी वो आशिक थोड़ी है हम बीच बाजार में मिलने आए वो आशिक थोड़ी है अभी तो जंग खुद से जारी है खुद को भूलकर तुम्हे �
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एक राह पर
तू चला तो रास्ते भी चल पड़े। टूट गया था जो पिछली रात को हौसला देख के तुझको वो भी निकल पड़ा अपना कल बनाने में न जाने कितन�
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