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गेरो का बन जा हमदर्द,
गेरो का बन जा हमदर्द, मेरा बस दर्द बन जाना बुझ जाए हमारा दिया, ऐसा हवा का झोखा बन जाना
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मेरी नानी
मेरी नानी का नाम बशीरा था। उनका जन्म देगलूर महाराष्ट् राज्य में हुआ था। उनके पीता एक शिक्षक थे। मेरी नानी चौंथी तक
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मेरे स्कूल का दूध
कविता - मेरे स्कूल का दूध (एक घटना) दुःख ही जीवन की कथा रही यह सदा कष्ट की व्यथा रही। कब तक कोई लड़ सकता है! कब तक कष्�
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मैं फूल हूँ
मैं फूल हूँ काटों से लिपटा रहता हूँ कही भी कही भी हर मौसम में मिलता हूँ मैं कोमल हूँ और नाजुक भी मैं फूल हूँ मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद
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आधा आधा
मैं फूल तू काटा फिर भी दोनों आधा आधा तू मुझ से दुखी दुखी फिर भी रक्षा करता हैं मैं कोमल नाजुक कली तू निठुर काटा फिर भी दोनों आधा आध
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चिन्तन
जिसे धर्म और धन का चिन्तन है वह तो सुबह सवेरे उठता है, उठकरके वह आचमन करके संध्या वंदना के लिए बैठता है।
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सदाचार
जो सदाचार को करता है वह दीर्घ आयु को पाता है, सदाचार से लक्ष्मी, धन परलोक में कीर्ति को पाता है ।
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प्रतिशौध या प्रायश्चित ! (खण्ड-3)
प्रायश्चित या प्रतिशोध (खण्ड-3) दिल्ली में जनवरी का मध्य भाग भयंकर ठंड का समय होता है। तीन दिन से कोहरे के कारण सूर्य के एक पल भी दर्शन �
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मोटी मोटी आंख कटीली
मोटी मोटी आंख कटीली रूप निराला से 🌹🌹 जूली चिमटा लिए नाथ बागों में आर्या से 🌹🌹 सूरज चंदा जो मुख चमके फैल रहा उजाला है शीश गंग माथे पर च
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समझदार
तब तो वो समझदार नही थी पागल तो मै था अब वो मेरी तलबगार नही थी जाने- अनजाने गलती तो उससे हो गयी दो नैन से नैन मिलाने की तब तो वो समझदार नह�
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तन की चोट
मन की चिंता तन की चोट कौन देखेगा किसे दिखाऊ जख्म देने बाला भी अपना अच्छा रह जाना है मौन बदन का भूख जिस्म की प्यास हृदये के पीड़ा समझ�
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मुझे क्यों सताया जा रहा
मैं बचपन हूं मुझे क्यों? सताया जा रहा अभी तो उड़ना सीख रहा था,कि चार दीवारों में डाला जा रहा, आंचल का तो पता नहीं पर बसते की बोझ में द
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