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पढ़ने वाली कुर्सी
नमस्ते दोस्तों 🙏🙏 दोस्तों ! मैंने आज की कहानी का शीर्षक रखा है ...." पढ़ने वाली कुर्सी "! पलक का आज बर्थडे था । वो सुबह से तैयार थी । अपन�
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प्यार किसी और से
तुझे प्यार है किसी और से और हम हैं कि तुमको चाहते ए भुल है हमारी सनम जो सब कुछ हमारा तुमको है मानते समझता तो है सब कुछ लेकिन दिल मानता
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कान्हा तोसे अरज हमारी बस विनती मेरी एक स्वीकार करो
कान्हा तोसे अरज हमारी विनती मेरी स्वीकार करो ,तेरे नाम का हो एक समुंदर जिसमें मैं हर रोज डूब जाऊं कान्हा तोसे अरज हमारी विनती मेरी स्व�
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महफिले सजी लोग जुटने लगे
महफिले सजी लोग जुटने लगे, जब आया गम तो लोग छंटने लगे, बस कुछ रह गए अपने खास मत करो झूठे लोगों पर पैसे बर्बाद।
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कभी ना इसके झांसे में तू आना
तू भी शून्य मै भी शून्य , अहंकार को तू कभी न चुन , सरल तू नदियां सा बन जाना कभी ना इसके झांसे में तू आना।
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ए वक्त ना होता सब का एक जैसा
कभी वक्त होता है खुशी का कभी वक्त होता है गम का कभी वक्त होता है आसमान को छूने का कभी वक्त होता है आसमान से गिरने का कभी किसी के खातिर द
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आंखों से देखो संसार यह सुंदर
कभी विचार एक तुम करना ,कभी विचार एक तुम करना अगर पढ़े तुम्हें बिना फोन के रहना जी लोगे हर घड़ी तुम अपनी दूसरों के जीवन में ना रुचि लेनी �
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चार की सूरत प्यारी नहीं इस जग में
चार की सूरत- प्यारी नहीं इस जग में, ये घोलते ज़हर जीवन में नासूर बन रहते इस तन में जीवन भर देते- असहनीय पीड़ा, नाम है इनका- काम-क्रोध-म�
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एक तरन्नुम उठ रही है दिल में मेरे
एक तरन्नुम- उठ रही है दिल में मेरे आ चलेंगे कहीं दूर- इन वादियों में निर्झर, बहती तो होगी दरिया वहां गाते तो होंगे पंछी वहां आ चलेंगे
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अपनी ही निगाहों में गुनहगार हो गई हूँ
अपनी ही निगाहों में गुनहगार हो गई हूँ हर सजा की मैं हक़दार हो गई हूँ तमाम उम्र नहीं देखूंगी ख़ुद को आईने में ऐ ख़ुदा! मैं इतनी दागदार हो गई
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जादू सच नही होता
कविता -कागज और नोट बचपन में पढ़ने का या अच्छा कुछ करने का मन कहां? और कब? होता है। पर मां समझाती थी एक ही बात बताती थी पढने से कुछ करन�
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अच्छे साथी के सपने
एक लड़की बचपन से ही अच्छा साथी मिलने की तमन्ना रखती है या अच्छे साथी के सपने सजाती है। जब लड़की बड़ी हो जाती है तो उस लड़की की शादी की �
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