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सावन बिदाई
सावन बीता थम गए सेरे गरजे बादल भादो बरसे गौरी गई ससुराल पिया संग डालन से खुल गए झूले | अब सुनी गलियन कौन निहारे बरखा में सब बं
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सावन
किसलय सा तन है मेरा सखी आज यह कुंभ लाने क्यों लगा सावन की रिमझिम बरखा में है अंग अंग बल खाने लगा इसको मां की ममता समझूं या समाज ने रचा
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💖 अमन विश्व का तारा ✍️
ऐ ज़मी शाहे वतन, आप पे दिल कुरबान है! कुरबान ज़ान भी गुल को तेरे, जिससे वतन गुलज़ार है!! है नुतन प्रभा का यहां सवेरा, औ
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💖 अमन विश्व का तारा ✍️
ऐ ज़मी शाहे वतन, आप पे दिल कुरबान है! कुरबान ज़ान भी गुल को तेरे, जिससे वतन गुलज़ार है!! है नुतन प्रभा का यहां सवेरा, औ
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# अव्यक्त ...
# अव्यक्त ... हुआ बहुत ही धोखा , इसमें ऐसा ही होता ...! कहीं-कहीं रात चांदनी , कहीं अंधेरा होता ...! प्रेम ग्रंथ के पन्ने खोलूँ , लिख लूं अपनी �
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सतगुरु का दरबार 🌹🌹
दुनिया में सबसे न्यारा मेरे सतगुरु का दरबार से सतगुरु का दरबार से मेरे बाबा का दरबार से 🌹🌹 महल अटारी दौलत सारी दुनिया एक झमेला रे म�
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एक चुप की सजा
मैं चुप क्या हुआ😓, सब चिल्लाने लगे कल था टेस्ट जिस खामोशी में शांत बैठा था 😟 ना पढ़ पाए मेरी खामोशी बस लांछन लगाने लगे टीचर भी मुझे फा
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शीर्षक (दृढ़ निश्चय)
शीर्षक (दृढ़ निश्चय) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) मंजिल यू ही नही मिलती आसानी से। मंजिल के लिये चलना पड़ता है। मंजिल के रास्ते है कई सह�
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बचपन
ना हँसना एक बहाना था ना रोना किसी से छिपाना था ना थी कोई जरूरत, ना कोई जरूरी अफसाना था वो बचपन का मौसम भी कितना सुहाना था.. गिरकर उठना, �
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दुआ तूने भी तो की होगी
देख के उदास मुझे, आंखे तेरी भी तो रोई होगी, करने को खुश मुझे, दुआ तूने भी तो की होगी ।
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आजकल
कुछ इस तरह से हम दिल को बहला रहे हैं आजकल कुछ कह रहे हैं कुछ सुन रहे हैं कुछ समझा रहे हैं आजकल कि तुम मेरी जिंदगी में ना सही मेरे खया�
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नश्वर काया
नश्वर है जब तेरी काया बंधन में मन क्यों लगाया पाई- पाई धन जो तूने जोड़ा संग अपने क्यों ना ले पाया समझा जिसको तूने अपना चिता पर उन्हों
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