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"अंत में ही अनंत"
कृपा अनंत का यह तन, में अंत वा अनंत। चंद श्वासों का यह जीवन, श्वास में हीं अनंत। मोती-
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"हुजूर का दरगाह"
ढूंढता प्यासा निगाह, अनजान वह सूरत। सुरति जगी दिल अंदर, दरगाह में हुजूर।। मोती-
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मत सता
शीर्षक - मत सता हे ! मन मत मचल, बस कुछ दिन ही बाकी है। रहम कर इस दीन पर, सर पर कुछ जिम्मेदारी है। हे! नींद मत सता, पूरी रात अभी बाकी ह�
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"ईश प्रेम"
हिय प्रवाहित ईश प्रेम, उर में प्रगाढ़ भक्ति। जन्म-जन्मांतर का तप, तपे साईं परगट।। मोती-
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वक्त
जितना चाहे छुपा लो, ये तो सच हैं निकल ही जाता हैं कसलो चाहे जितनी मुठ्ठी, रेत ही तो हैं, फ़िसल ही जाता हैं मिले कभी दुःख ऐ दोस्त, तो गम न क�
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खुशियां खूब मनाओ ना ( बाल दिवस पर कविता)
चाचा नेहरु न्यारे थें हम बच्चों के प्यारे थें चाचा फिर तुम आओ ना हमको गले लगाओ ना दूर जहां तुम जाओगे बच्चों से मिल आओगे हमको साथ धुम�
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ये उलझी उलझी जिंदगी
यह उलझी उलझी जिंदगी, सुलझ ना पाये, ये फैला है जीवन में कैसा जाल, जिससे निकल ना पाये॥
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शायरी
सालौं लग गए खुदको ‌समझाने में की कहीं हम पागल तो नहीं थे आपको कुछ समझाने में।
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कोई गिला नहीं
खुद को खुद में समा लिया है अब कुछ खोने का डर ही नहीं कुछ कमी तो है जीवन में मेरे पर मेरे चेहरे पर शिकन नहीं कुछ दिल में गहरे जख्म है अ�
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शायरी
सही है तुम दुर हो नहीं तो यह एहसास ही नहीं होता कि कोई दोस्त इतना करीब है।
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पलकें झुकने का मतलब ये नहीं
पलकें झुकने का मतलब ये नहीं कि गुनाहगार हूँ मैं संस्कारों की बेड़ियों में गिरफ़्तार हूँ मैं - त्रिशिका श्रीवास्तव ‘धरा’
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"स्वांस के झूले में-हंस"
मन के हैं चार तरंग, बुद्धि-चित-अहंकार। बस में नहीं मन चंचल, बुद्धि का नहीं मोल! अहंकार तो सरताज, गया चेत सब शुन्य। चेतना हुआ चैतन्य, जब
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