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हितैषी
हितैषी तब तक हितैषी रह पाता है, जब तक उसके निजी स्वार्थ में कोई आँच नहीं आता है। जब उसके उसके निजी स्वार्थ पर कोई आँच आ जाता है, तो वो हि�
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मेहनत
हाथ में हाथ धरकर बैठने से कुछ नहीं मिलता। सुना है, परिंदो को भी उड़ने के लिए पंख खोलना पड़ता है यह जिंदगी है साहब! यहां मेहनत का बीज जो �
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मीट्टी का श्रंगार
छांव में धूप की रोशनी है, उज्जलों में तेरी गजरती है,कई रास्ता हवाओं में रेह जाती है, नमी तेरी इस मीट्टी के कण-कण में, धरती का श्रंगार| हि
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सून ऐ मेरे खूदा
अंधेरों में शाम की तलाश तेरी फिजाओं में गुमसूम सी आवाज तेरी मौजूद है, जिंदगी में सभी कैद हुऐ हम जंजिरो में अरमानों में रोशनी तेरी फि�
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मन के मुलायम
कविता -मन के मुलायम चल कर अपने जीवन पथ पर बदला समाज अपने बल पर निज प्यार लुटाया कर भरकर की राजनीति खूब चढ़ बढ़कर अर्पित है सुम�
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शरद ऋतु
तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में शरद ऋतु का गुणगान करते हुए लिखा है- बरषा बिगत सरद ऋतु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई॥ फूलें कास सकल महि छाई�
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दहेज की आग
दहेज की आग एक रसोई से धुआँ उठा, आग लगी, लपटे बाहर निकली, शोर में कुछ चीखें चिल्लाती, भीड़ में लोगों की कानों आयी, बचाओ-बचाओ, कोई बचाओ, आग
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भबिष्य
भबिष्य के बारे मैं जो नहीं सोचता, बो बर्तमान मैं ही रह जाता है, बाद मैं आगे पश्चताप करने के अलाबा उसे कुछ प्राप्त नहीं होता है !
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रास्ता
रास्ता जैसा भी उस पर चलना चाहिए, रिस्ता जैसा भी होगा उसे निभाना चाहिए!
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मेरी प्यारी मा
मा तो सबकी प्यारी है ये तो सबसे न्यारी है। मा के जैसा कोई नहीं है ये कहती दुनिया सारी है।। मा तो कभी भी कुछ ना कहती वो तो हमेशा चुप ही रह
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तुम कैसी मां हो?
कविता -तुम कैसी मां हो? फेंक चलीं क्यों ?दिल रोता है! कूड़े में अब दम घुटता है! अंदर ही अंदर दहता है! कितनी विह्वलता है ! मां की
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अंतर्मन
दूसरों के बारे में तो हम बहुत चाव से और बहुत ही उत्सुकता पूर्वक बातें करते हैं उनकी अच्छाइयां उनकी बुराइयां परंतु कभी-कभी हमें स्वयं क
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