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चादर
कविता-चादर ठिठुती ठंड में कुहासे के बीच ओसों से तर कपकपाती बदन भीनी चादर के बीच दो नन्हें बच्चों को सीने से लगाए लिए बैठी कांप रही थ
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किश्ती
कविता-किश्ती प्यार की किश्ती में हम दो राही चले जा रहे थे स्मृति में लिए जीवन की कुछ यादें, जीवन जलधि में उठते तरंगों में थपेड़ों क�
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शीर्षक (महामारी कोरोनावायरस)
शीर्षक (महामारी कोरोनावायरस) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) एक आपदा ऐसी आयी सारी दुनियाँ चीख़ी चिल्लाई। चारों तरफ़ थी चीख़ पुकार लोगों
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ये महंगाई की कैसी मार
ये महंगाई की कैसी मार न ऊंचाई न आधार कब आलु प्याज सोने सम बन जाएं न जाने सोना कहां बिकवन आए हीरे का तो न कोई पार, ये महंगाई की कैसी मार �
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* पिता *
* पिता * सुखी उसी का जीवन है जो प्यार पिता का पाते हैं । अपने अनुभव और धैर्य से परिवार का रथ ये चलाते हैं ।। अपने जीवन में श्रम करके परि
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स्वाभिमान
हम न किसी से कम। बस, लगाओ दम। हिम्मत की क़ीमत, क़ीमत ज़िद्दी विचार में। अंदर से जगानी पड़ती, नहीं मिलती हाट बाज़ार में। हुकूमत उनकी ही �
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सवाल मर नही जायेगा
मस्जिदों को ढहाने से सवाल नही मर जायेगा मंदिरों को बनाने से सवाल नही मर जायेगा सवाल फिर भी जिंदा रहेगा रहती दुनियाँ तक सवाल,बेरोजगार�
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* कर्म हमें करना होगा *
* कर्म हमें करना होगा * भाग्य हमारे साथ है फिर भी कर्म हमें करना होगा । कामयाब होना है हमको तो मेहनत करना होगा ।। चींटी जैसी मेहनत करक
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बो हाथ बदला हैं
कौन कहता है की देश बदल रहा हैं मुझे तो लगता हैं समाज बिखर रहा हैं तलबार बही हैं बस धार कम हैं काटने वाला गर्दन भी बही मजबूर और मजलू�
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सुरमा और काजल
ना लगा एक ऑख में सुरमा, और एक ऑख में काजल तू। गर कसूरवार है दो तो संतोष, तो फिर सजा एक को आखिर क्यों।। क्या बन्द पड़े हैं मुख तुम्हारे ,
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दुराचारी
चरित्रवान भला वो कैसे, भला कैसे वो स्वाभिमानी थे । जिसने धोखे से हरण की हो सीता, भला कैसे वो महाप्रतापी थे ।। जिसने अपने स्वार्थ के ख�
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* पक्षी *
* पक्षी * पक्षी तुम कितने अच्छे हो ऊंचाइयों को छू सकते हो। ऊंचाइयों पर उड़कर पक्षी गर्व नहीं तुम करते हो ।। राग द्वेष नहीं मन में तेर�
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