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शीर्षक (गर्मी)
शीर्षक (गर्मी) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) मौसम का हाल ना पूछो गर्मी से है बहाल ना पूछो। ऎसी कूलर सब आन है फिर भी घर में बहोत तापमान ह
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पढी-लिखी लडकी रोशनी घर की
पढ़ी-लिखी लड़की रोशनी घर की जिधर भी जाए घर को रोशन करती एक नहीं वो कितने घरो का मान बढ़ाएं मन में है लाखो राज वो उन्हें दबाये बँधी है व
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शीर्षक (जिन्दगी और मौत)
शीर्षक जिन्दगी और मौत मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) मौत तो यूँ ही बदनाम हैं। लोग तो जिन्दगी से परेशान हैं। जिन्दगी हर रोज़ लाती एक नय
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विश्वास
हम भले ही किसी को ध्येय की दृष्टि से देखे, उस पर विश्वास करे या ना करे हम भले ही यह कहे की ये दुनियां विश्वास के काविल नही�
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फेक आया हूँ
जब तू था तो मैं नहीं अब मैं हु तो तू नहीं अजब खेल हैं तेरा आज तू कहि और अश्क कहि कुचल दिया दामन दफ़न कर दिया यांदों को उसी जगह जहा कभी
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अग्नि कुंड में
बस तुम्हे जलना होगा तपति अंगार पे चलना होगा देना होगा अग्नि परीक्षा फिर से तुम्हे सहना होगा क्या स्त्री ही वार वार सत्यता का परिच�
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*स्वातंत्र्य राष्ट्र*
*स्वातंत्र्य राष्ट्र* जाने कितने वीरों ने अपनी जान गवाई होगी, तब जाकर के भारत ने आजादी पाई होगी, भारत की माटी का शत-शत वंदन करते हैं ब�
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दावत
मैं दावत खाने बैठा था कौन अपना कौन पराया मैं खुद अंजान कौन बिन बुलाए मेहमान किन्तु प्रेम का संगत अनूठा था, देख देख कर एक दूसरे को पू�
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संपर्क
कविता-संपर्क क्यों टूट जाता है संपर्क दूरी बन जाता है सदा के लिए अपनों से, देखा है लोहे को तैरते नाव के संपर्क से अथाह गहरे हौसलों स
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जिक्र भी होगा और फिक्र भी होगा
ज़िक्र भी होगा तुम्हरा ,फ़िक्र भी होगा तुम्हारा जिस दिन माँ न होगी घर मे,वो घर भी मंदिर ना होगा तुम्हारा ये जो करीब का रिश्ता ,गरीब
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कास मेरा जन्म एक पंछी जेसा होता
कास मेरा जन्म एक पंछी जेसा होता/ में भी आसमान मे उड पाता तो इस दुनिया की नस्वर्ता को देख पाता, कास मेरा जन्म एक पंछी जेसा होता/ कभी इस
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वहाँ मेरा श्याम नजर आता हे
जहाँ ना कोई उम्मीद का सहारा नजर आता हे वहाँ दिल बड़ा घबराता हे एक पल याद करूँ तू वहाँ मेरा श्याम नजर आता हे/
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