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कविताएँ
उपासना
वो अर्द्ध देती उपासना -सी वुद्ध की विपासना-सी वो स्त्री ही तो है...! यू.एस.ब�
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गांधी जी
कविता -गांधी हे! मानव तू सीख सीख ले बापू जैसे इंसानों से मानवता से निर्मित तन मन सत्य अहिंसा इमानों से, संत पुजारी देशभक्त तू जनहित
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☝ सर्व स्वत्तंत्र भावों भवान्.... ✍️
1 हैं लाख चाहत्तें ले कर के, स्वाधिनत्ता पथ हो के आज़ाद चलें! अब चलो चले कर मन स्वत्तंत्र, बनने स्वत्तंत्र निष्ठा: चलें!! 2
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तुम्हें याद नहीं
क्या तुम्हें याद नहीं कितने बिताए लम्हें साथ छोड़ के तुम चले गए ऐसे मेरा हाथ अब पास मेरे कुछ नहीं सब ले गए तुम अपने साथ। धन्यवाद
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वीर
कुछ गोलियां लगी थी पैरों में फिर भी सोच थी कि रुकना कहा ज़रूरी है घुटने अभी ज़मीन पर गिरे नही देश भक्ति अभी अधूरी है वो धरती कितनी रो�
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🤗 गर्दिश के सित्तारें 👌
है मिली रौशनी अंधेरों को, बन सुर्य प्रभा का ऊदय हुआ! बन दिनकर और दिवाकर स्पनें त्तेज़वान, अपना वक्त सत्तीरों कि लड़ीयों सा!!
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आत्म विश्वास
नमस्कार । मैं उपस्थित हूं एक नई कविता से के साथ और मैं इस कविता में बताऊंगा कि अपने ऊपर विश्वास होना चाहिए और खुद पर विश्वास होना तो बड�
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स्कूल का पहला दिन
वो मेरे स्कूल का पहला दिन था बारिश हो रही थी और स्कूल बस दरवाज़े पर खड़ी थी मेरी ज़िद थी की मुझे नहीं जाना और न जाने क्यों माँ ज़बरन भेजन
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👏 त्तलवारों संग चली कलम ✍️
है पन्नों कि धार - धार, लेकर विचार मानवत्ता का! और ज्ञान - मान के पथ से चली, करत्ता स्वर्णिम प्रारूप हर जर्रों का!! जो रक्त से ले�
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मातृभाषा
कविता = ( मातृभाषा ) हमारे एक भूतपूर्व नेता जी ने ! हिंदी दिवस मनाया ! पंडाल के बाहर ! हैप्पी हिंदी डे का बोर्ड लगवाया ! मुख्य अतिथि के रूप
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शीर्षक (गुज़रा ज़माना)
शीर्षक (गुज़रा ज़माना) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) वो गुज़रा ज़माना बहोत याद आता है। जब माँ के गोद में बैठ के खाना खाते थे, पिता के कंधे प
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👍 विद्या अभिलाषी ✍️
त्तु विद्या मै विद्या धन का अभिलाषी, भर दे ज्ञान का धार सभी! मन के कण - कण हो शुधा का निरव, और दुर रहे ध्यान से विकार सभी!! अज़ी �
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