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कविताएँ
माता मैं भी बुद्ध बनूंगा
"बुद्ध बनूंगा" ज्ञानवान आत्म का स्वामी तपकर अंतर शुद्ध बनूंगा माता मैं भी बुद्ध बनूंगा घटा कोप इस कालखंड को चीर भोर का पुष्प खिलूंग
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जिम्मेदार बन
जिम्मेदार बन जब तू अश्रु बहाना चाहे, रोक लेना उसे, कंही बाहर ना आ जाए, अंतरात्मा को अपनी तुझे, उस अश्रु बिंदू से ही स्वच्छ करना होगा, त
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लगता है इंसान होना पाप से है कम नहीं
लगता है इंसान होना पाप से है कम नहीं तार है इंसानियत इंसान को है गम नहीं क्या सही है क्या ग़लत न तौलता इमान को मार कर इंसानियत को पालत�
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मैं यथार्थ सत्य हूं
"रूह"मैं क्षणिक क्षण भुंगर नहीं मैं यथार्थ सत्य हूं किन्तु तुमको दीख ता जो मैं वही असत्य हूं' हूं चराचर में रमा क्या कोई मुझको जानता ह�
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छप्पर वाले यार पुराने आंगन में
छप्पर वाले.... छप्पर वाले यार पुराने आंगन में औस टपकती रात सिराहने आंगन में चादर में ढकता हूं तन जैसे तैसे कैसे सोऊं रात बिताने आंगन मे
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मैं कुछ बेहतर नहीं लिखता
"मैं कुछ बेहतर नहीं लिखता" मैं कुछ बेहतर नहीं लिखता यूं ही जिस ओर देखता हूं, दर्द में डूबे लोगों की "आह" जब भीतर उतरती है निकाल लाती है व
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रूपवती
तुम रूप का भंडार लिए सोनभद्र नदी बनी मैं छोटा सा आकार लिए एक बूंद जल बना। तुम भिन्न-भिन्न श्रंगार किए एक गंगधार बनी मैं सिर्फ ठूंठ पत्�
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ढूंढने में देर ना कर
खाक पर ही बात होगी जिस्म का गुरुर न कर नाम जप मालिक से मिल खुद से खुद को दूर न कर। डूबने में भेद है पर ढूंढने में देर ना कर, रब तेरे भी�
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मेरी दौलत—पापा की बदौलत
मेरी दौलत—पापा की बदौलत मेरे पापा कभी सख़्त हो जाते हैं, कभी सरल हो जाते हैं, मैं इस बात से हैरान हूँ, वक़्त के साथ-साथ कैसे वो हर वक़्त
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देश प्रेम
देश प्रेम तेरे बलिदानों ने कुछ अलग लिखी कहानी थी, शौर्य, पराक्रम, साहस और देश के प्रति प्रेम से सजी तेरी पूरी जवानी थी। जब बच्चे लड़क�
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Humare Bhim
हमारे भीम सोच थी उसकी निराली, जानता था नही बजती एक हाथ से ताली, जब भी देता नई सोच वो,, होता उसका पुरजोर विरोध जो, पर यह उसके अपने संघर्ष
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Guru Jivan ki Aadharshila
गुरु: जीवन की आधारशीला 🌟 जब तक हाथ न लगे कुम्हार का, मिट्टी साँचे में नहीं ढलती है। नाविक बिन तो नाव भी नहीं सही दिशा पकड़ती है। जब तक
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