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हे सम्बन्ध पुराना तुमसे-दे गये हमे अनेक धरोहर
दे गये हमे अनेक धरोहर प्रकृति का ये दृश मनोहर उसके रक्षक सारे जन , है सबकी यह दित्य धरोहर ये बह�
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स्वार्थ-मैं उन्हें जानता हूँ पर वो मुझे पहचानते नही
मैं उन्हें जानता हूँ पर वो मुझे पहचानते नही , बिना काम के वो मुझको
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जीवन है कि आना जाना- जन्म हुआ फिर हे बचपन आना
जीवन है कि आना जाना जन्म हुआ फिर हे बचपन आना बचपन आया फिर यौवन आना यौवन आया फिर बुढ़ापा आ�
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जिम्मेदारी-सुबहाँ सुबहाँ रोज जगा देती है
कौन, सुबहाँ-सुबहाँ रोज जगा देती है। रात अन्घेरी को भगा देती है । सुबहाँ हो गई उठों ऊमीद की आवाज़ से सवेरे की रोशनी दिखा देती है।। रू�
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मैं क्यूं हारु-जब लगी हो मन में तब चेन कहां जीवन में
"मैं क्यूं हारु" पढ़ना हैं मेरा करम किताबे हैं मेरा चरम जीवन में हैं कुछ सपना जो किताबों से होगा अपना किताबों से लाना हैं सैलाब और ज्�
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राम आयेंगे-भक्तों के भाग जाग जायेंगे प्रभु अपने घर लौट आएंगे
"राम आयेंगे" भक्तों के भाग जाग जायेंगे प्रभु अपने घर लौट आएंगे इंतजार में सुखी आंखे अब प्रेम रस में भीगेंगी खुशियों की रौनक गली गली
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देख चेहरा अपने मां-बाप का हर प्रयास यही कि
जब लगे की जिंदगी में काम का बहुत प्रेशर है तो देखना चेहरा अपने मां बाप का जब लगे कि जिंदगी बहुत कठिन है या कि मुझे यह ना हो पाएगा तो
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पर्व मकर संक्रांति का-सूर्य उत्तरायण हुए रुचिकर हुआ उजास
सूर्य उत्तरायण हुए,रुचिकर हुआ उजास। पर्व मकर संक्रांति का,भव्य बहुत ही खास।। सूर्य उत्तरायण हुए,देंगें सबको लाभ। होगा दिव्य विकास �
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वह राम कहां से लाऊं मैं- शबरी के जूठे बेरों से जो तनिक नहीं
वह राम कहां से लाऊं मैं शबरी के जूठे बेरों से जो तनिक नहीं भी बैर किया सब ऊंच - नीच के भेदों से जो ना अपना ना गैर किया उस पुरषोत्त�
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उड़ रही है पतंगे-आज रंग विरंगे पतंगे
आज इस सक्रान्ति के अवसर पर उड़ाते है हर लोग पंतगे आज ये नीला गगन भी हो गया है। रंग विरंगे । उड़ रहै नीले ग�
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छोड़ दिया था तन्हा मुझे-जुदाई का गम दे दिया था
तन्हा छोड़ दिया था तूने मुझे जुदाई का गम दे दिया था तूने मुझे कैसे बतलाए तुझे हम अंदर तक तोड़ दिया था तूने मुझे बहुत तड़पा लिया अब ना
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तेरी जिंदगी से जा रहे हम-लौट कर ना आयेगें तेरे दर पे दुबारा हम
सनम तेरी जिंदगी से जा रहे हम लौट कर ना आयेगें तेरे दर पे दुबारा हम तू खुश रहना अपने प्यार के साथ मेरा प्यार तो निकला किसी और का सनम मेर�
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