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"सुबह की मीठी नींद"
"सुबह की मीठी नींद" इस नींद के चक्कर में किसी का पानी भरना रह गया तो किसी को स्कूल के लिए लेट हो गया किसी की बस छूट गईं तो किसी की दफ्तर
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"दिवाली की छुट्टियां"
"दिवाली की छुट्टियां" छुट्टियों और मिठाइयों से भरा मस्ती और उमंग का त्यौहार पर समस्या तो तब होती जब मम्मी ये बोल देती तुम्हारी छुट्�
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रीत जगत की
"रीत जगत की" क्यों रीत जगत ने ऐसी बनाई खुद के ही घर से कर दी पराई अपनो से हो गई दूरी जीवन की ये कैसी मजबूरी बचपन का आंगन छुटा आंखो से जै
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मां
"मां" मां से हैं जीवन में सुख मां के बिना जीवन भी एक दुःख मां से ही मेरी सुबह मां से ही मेरी शाम मां मेरी प्रथम गुरु मां से ही मेरा दि�
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मोबाईल
"मोबाईल" फ्री होके भी सबको व्यस्त कर दे वो हैं मोबाईल कुछ ना आते हुवे भी सब सिखा दे वो हैं मोबाईल अपनो से दुर होके भी पास का एहसास दे वो
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अब हुनर आ गया
मांगते थे खुशी पर केवल मिलता रहा गम , होकर निडर चले पड़े गम से लड़ने के लिए हम ।
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जिन्दगी के लम्हे
गुजरती जिन्दगी के सारे लम्हे खूबसूरत ना हो सके तो क्या हुआ... कुछ यादगार लम्हों को ही जिन्दगी की सफलता समझो... -दिनेश कुमार कीर
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बोझल नजरें
दूरियों के दरख्त🌱 अब बढ़कर जंगल हो चले🌴🌳🌲 भीतर होंगे गुल🌻,कलियां🌱,गुलाब🌹,पंछी🕊️,नदी🏞️,झरने🌊,पहाड़ 🏔️ क्या इनसे गुजर कर मिल पाऊ�
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कैसा हूं मैं
इस दुनिया की भीड़ में अकेला हूं मैं झूलती हुई लो-सा हूं मैं है सब यहां मेरे अपने,कहीं ना कहीं अकेला हूं मैं कुछ ऐसा कुछ वैसा हूं मैं अ�
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उज्ज्वल की राहों में
रात बदलती है दिन के लिए, अंधेरा बदलता है उजाले के लिए, सितारे बदलते हैं चन्द्रमा के लिए, तस्वीर बदलती है मोती नयन के लिए, स्वप्न बदलता
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अश्क
मुक्तलाए भूल को बयां करती है आंख जिस्म के अदा को बयां करती है आंख अश्क के दर्द को छुपाती,दिखती है आंख दिल के दर्द को बयां करती है आंख How
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नया सवेरा
चाँदनी के नृत्य में, गहरा सफर है यह, पुनर्निर्माण की खोज में, अनिश्चित समर्थन में। जब चाँद रोता है, और तारे सजग हैं, सहनशील आत्मा है, एक �
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