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कविता-मन की मार बन अभिशाप जगत में बेटी मैं छिप कर क्यों जीवन जीती किसे सुनाऊं कौन सुनेगा किससे दिल की बात कहूं मैं? read more >>
कभी वक्त था तो वक्त ना था ,डरते थे कहने से । मुस्किल में होते वो , तब डरते थे उनकी मुस्किल सहने से ।। वो रोज अदब से सुबह सर नवाते थे , क्या read more >>
लड़ते लड़ते थक सा गया हूं । शायद हार से डर गया हूं ।। मुस्करा के गम दफनाते दफनाते थक गया हूं। शायद मुस्किलो से डर गया हूं ।। चलते चल� read more >>
आज उदासी से भरा बाग में बैठा था ,पता नहीं क्या मन में था ? ना किसी की याद थी ,ना कोई यादों में । ना कोई बात थी , ना मै किसी के वादों में ।। म read more >>
बैठा बारव्हीं सीढ़ी पर , भूला अपने आप को था | ना था साथ किसी का , बस दर्द का साथ था | मै बैठा था , जिस सीढ़ी पर | वो इस सफर का , आखिरी पायदान थ read more >>
उभरते हैं सीरत के दाग, सब सूरत पर। पैतरे लाख आजमाएं, कुछ बदल बदल। दर्पण माफिक झलकता रूप, है शक्ल-शक्ल। गिड़गिड़ाता दिखता है झूठ, निज जर� read more >>
पिता शीर्षक-पिता जीवन भर बोझा ढोता है। अक्सर सुख से कब सोता है।। सीने में दफनाता हर गम। कभी न खुलकर वह रोता है।। हर विपदा के आगे वह read more >>
जमाना बदल रहा है कुछ हम भी बदल रहे हैं कुछ हवाएं मेरे साथ हैं कुछ मेरे विरुद्ध चल रही हैं जमाना बदल रहा है कुछ हम भी बदल रहे हैं कु� read more >>
परेशानियां तो मुझे भी है आपको क्यों लगता है कि आपके आने से मैं खुश हो जाऊंगी हो सकता है दिल मेरा अभी गमगीन भी हो दिल तो अभी तन्हा ह� read more >>
हम ने खुशियां उधार में दी थी, साहब ! हमें क्या पता था, कि वक़्त पर उधार कोई लौटता नहीं । read more >>
हर समय किसी न किसी के लिए दुआ किया करो, हो न हो, कोई न कोई आप की दुआ के भरोसे हो । read more >>
* अन्तर्राष्ट्रीय कविता दिवस * पर समर्पित कविता कवि की आत्मा होती कविता शब्दों का स्पंदन कविता । शब्दों को माला में पिरो read more >>
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