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हम बेटी है कोई सामान नहीं है-जितना सोचते हो उतना आसान नहीं है
जितना सोचते हो उतना आसान नहीं है हम बेटी है कोई सामान नहीं है जब चाहें जैसे उपयोग में लाओ तुम रौब अपना हम पे दिखाओ तुम इतने गुमनाम नही�
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मानो बस इंसान हो-किस बात से हैरान हो
किस बात से हैरान हो मानो बस इंसान हो। कर्तव्य से परे ना हो धर्म का अभिमान हो। किस बात से हैरान हो मानो बस इंसान हो। जो तुम्हारे हाथ �
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मैं एक कवयित्री हूं-शब्दों की उधेड़बुन करके
मैं एक कवयित्री हूं शब्दों की उधेड़बुन करके करती अपने विचारों की अभिव्यक्ति हूं हां मैं एक कवित्री हूं ठहराव था कभी जिस कलम में उस �
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ये एक वादा है-वक्त जब मुश्किल होता है
वक्त जब, मुश्किल होता है। दिल कहता है। हार मान ले। ये आत्मसमर्पण के पल है। यहाँ-से आगे, अब ओर नहीं कोई कल है। अकेले, यों होसले के दम से
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औरत तेरी यही कहानी आंचल में दूध आंख में पानी-वस्तु नहीं है नारी नारी है शक्ति
औरत तेरी यही कहानी आंचल में दूध आंख में पानी< सदियों से ही औरतों को क्यों अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है औरत होना कोई पाप तो नहीं हर सदी मे�
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मुश्किल जब हो सामने-प्यास न जाने जात कोकरे न भेद अलाव
(दोहा छंद) मुश्किल जब हो सामने,ढूंढे सभी बचाव। प्यास न जाने जात को,करे न भेद अलाव।। इश्क कभी हो जाय जब,देखे कभी न रंग। प्यास न जाने जात �
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प्यास न जाने जात को-मौसम करे न वैर
(दोहा छंद) प्यास न जाने जात को,मौसम करे न वैर। सब पर एक प्रभाव दे,समझे कभी न गैर।। मुश्किल जब हो सामने,ढूंढे सभी बचाव। प्यास न जाने जात �
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स्त्रियां-मायके में ससुराल की इज़्ज़त
स्त्रियां बाथरूम मे जाकर कपड़े भिगोती है: बच्चो और पति की शर्ट की कॉलर घिसती है; बाथरूम का फर्श धोती है ताकि चिकना न रहे: फिर बाल्टी औ
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परीक्षा-चौधरी वीरभान सिंह की परीक्षा
कहानी- परीक्षा शब्द रचना- जितेन्द्र शर्मा चौधरी वीरभान सिंह ने भोजन किया व हाथ धोने के लिए नल के पास बनी चौकी पर पहुंचे। उनकी पत्नी स�
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अभी दरिया है- सेलाबे समुंदर तो होने दो
अभी दरिया है सैलाबे समुन्दर तो होने दो फलक के साये मे सो रहे है बो उन्हे सोने दो । ये खाके वतन की औलादे हैं इनकी आवाज नही दबती तख्ता प�
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कुछ तो काला दाल में- सूरत पर है हर्ष
(दोहा छंद) कुछ तो काला दाल में, सूरत पर है हर्ष। बात करें वह गर्व में, फिर भी हो उत्कर्ष।। कुछ तो काला दाल में,मिलता मुझ से रोज। करता बात�
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मुझे शिकायत है-आप हमसे अक्सर मिलते ही नहीं हैं
मुझे शिकायत है बहुत आपसे क्योंकि, आप हमसे अक्सर मिलते ही नहीं हैं। एक हम हैं जो आपके इन्तजार में, आँखें बिछाये खड़े हैं यहां कब से। गज�
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