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किसी बुनकर के चरखे की तरह चरखा विचारों का घूमता है
किसी बुनकर के चरखे की तरह, चरखा विचारों का घूमता है, बुनता रहता वो रात दिन ये मन रूपी धागा। धागा, जो धागा-धागा करके, एक पर्दा बन जाता ह�
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सपनों की दुनिया में उलझी रह जाती है
अबला नारी शक्तिहीन, अपराधीत और भयभीत, धीरे-धीरे संघर्षों में ही गुम हो जाती है। समाज की जालीम नज़रों से बच्ची, सपनों की दुनिया में उलझ�
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गहरी संध्या में उठा वीरान सा ध्वनि
विधवा की आवाज़ काली रात छाती पर आवाज़ लगी, विधवा ने निहारा और विचलित हो गई। गहरी संध्या में उठा वीरान सा ध्वनि, उसकी माटी से निकली कु�
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यह साक्षात्कार बिंदेश कुमार झा द्वारा लिया गया है जो मूल रूप से एक लेखक हैं
साक्षात्कार डॉ पीयूष गोयल यह साक्षात्कार बिंदेश कुमार झा द्वारा लिया गया है। जो मूल रूप से एक लेखक हैं। यह वर्ष 2023 में जुलाई माह में म�
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तुम बस मुस्कुराना-हजारों दीप जल जाए
हजारों दीप जल जाए तुम बस मुस्कुराना। निगाहें मेरी थम जाए तुम बस मुस्कुराना। दर्द जब भी बढ़े कि सीना चीर जाए हौसला उससे मिलने का कभी
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जब साईं का ठिकाना घट में है-तो मंज़िल भी तन में मिलेगी
नाहीं ज़िंदगी पतंग है कि कट जाएंगे। नाहीं राह अनजान है कि गुम जाएंगे।। जब साईं का ठिकाना ही हर घट में है। तो जनाब मंज़िल भी तन में ही �
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ईश्वर धरती देश जाति धर्म-सब कुछ एक है ना
"तू कहता है ईश्वर- एक है धरती एक है,,है ना"..! "तो देश-जात और धर्म- सब कुछ एक ही हुआ,,है ना"..!! -मोती
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मेरा तुम्हारा नाता क्या-इस जीवन के खेल में
"मेरा तुम्हारा नाता- क्या इस जीवन के खेल में"..! "देश-धर्म-जात-भेद- क्या इस जीवन के खेल में"..!! -मोती
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कांश मैं समझ पाता-वक्त के हाथों मेरा व़क्त था
कांश मैं- समझ पाता व़क्त को, समझा था व़क्त मेरा था,, मैं था ही बेखबर-इस, व़क्त के हाथों में मेरा व़क्त था..!! -मोती
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हीरा पाया था जिंदगी-समझ पाया न गुर
हीरा- पाया था ज़िंदगी, समझ पाया न गुर,, राह मिला- सतगुरु प्यारे, सीख पाया न गुर..!! -मोती
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आत्मज्ञान में अनुपम उपहार बन जाता जिंदगी
"एक तरफ- निकल जाता, सुख-दुख का चक्कर लगाते ज़िंदगी" "दूसरी- आत्मज्ञान में, अनुपम उपहार बन जाता है ज़िंदगी"..!! -मोती
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फ़लसफ़ा स्वंय का पड़ा पल्ले-नायाब हीरा बन गई ज़िंदगी
"फ़लसफ़ा- संसार का पड़ा पल्ले, यूंही गुज़र गई ज़िंदगी" "फ़लसफ़ा- स्वंय का पड़ा पल्ले, नायाब हीरा बन गई ज़िंदगी"..!! -मोती
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