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बाल-साहित्य
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बाल-साहित्य
खिड़की .... बीते कल की
कल मैंने अपनी खिड़की से अपना बीता हुआ कल देखा... उस कल में था वो लड़का, जिसे देखकर मेरी सुबह मुस्कुराती थी, शाम संवर जाती थी और रातें ख�
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हद हो गई- कारीगरी की
हद हो गई- इस कायनात की कारीगरी की, आंखों में दृष्टि, लबों पे आवाज है। कानों में सुनने की- अद्भुत क्षमता, नाक में- खुशबू , जुबांँ पे स्वा�
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रेल
रेल आओ बच्चों मिलकर खेलें एक साथ एक अच्छा खेल पकड़ पकड़ कर हाथ सभी का चलो बना लो लम्बी रेल, एक चलेगा इंजन भारी लेकर सार
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विजय का मूल मंत्र
"प्रथम कर्तव्य साधो, जो कर सकते, वही तुम साधो। हर असंभव का यही मंत्र, सहज-ए-सफलता का यही यंत्र।" -मोती
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सफ़लता की कुंजी
"जो सबसे जरूरी है, उसे सबसे पहले करो। जो तुम्हारी पहुंच में है, बस उसी पर ध्यान केंद्रित करो। क्योंकि हर असंभव को- संभव बनाने की यही
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सफ़लता का सूत्र
पहला कदम उठाओ, उस एक ज़रूरी काम को साधो, जिसे तुम- जानते हो कि तुम कर सकते हो। हर असंभव- दिखने वाले लक्ष्य की यह कुंजी है, सहज और सच्�
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हवा में है अपनी हस्ती का हर फसाना
हवा में है अपनी हस्ती का हर फसाना, हर सांँस में है जीवन का ताज़ा तराना। ख़ुशबू बनकर आती है हर रोज़ हवा में, जीने का है हर पल इक दिलकश बह�
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मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं,
मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।
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सोने की अति
सोना, तू क्यों नहीं रहा सोया? कच्ची नींद जागकर, कहांँ से कहांँ गया? सोना, तू सपने में आता। हाथ नहीं आए, दूर भागता। जब -जब, तू जागा, ग़
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एक डाट एक नई सिख
हर डाट से एक सिख मिली नई राह जाने की मंजिल कब के भटक गए होते याद न होती दादा जी के निसानी की
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भालू की शादी
जंगल में शोर है, चारों ओर उत्सव है। आज भालू की शादी है, जंगल में मंगल है। देखो, बंदर कैसे नाच रहा है। खरगोश भी मिठाई बांट रहा है। ठुमु
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आज का कल
अरे माँ की यादो को कैसे समेटेगा जमाना माँ तो वहा भी सोइ गीले में जहाँ बचाना था बच्चे को गीले कपड़ो से कैसे कह दे कुछ मुक्त हु माँ से जम�
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