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शहर और व्यापार-शहर बुलाता तो है मगर व्यापार के खातिर
बहुत है लेकिन हर बार के खातिर मकान तो लेकिन किरायेदार के खातिर और जो कहते है शहर बुलाता सबको है शहर बुलाता तो है मगर व्यापार के खातिर
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मां और घर-परिवार की बंदिशों में दफन
मैने देखा उसकी आंखो में लोहे जैसी आग की तपन थी वही हर रोज खून का घूंट पीना मगर परिवार की बंदिशों में दफन थी
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गांव और मैं-धूप की तपन में या अंधेरों से किनारा
धूप की तपन में या अंधेरों से किनारा हजार हजार ख्वाहिश की कल्पना है सारा और मन को बहलाने की कोशिश ही बेकार है मन लगता है अपने गांव में औ�
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अकेले-जब गुंजाइश की कसर न हो
जब गुंजाइश की कसर न हो अपनो की शिकायत का असर न हो तो शायद मिलता है बड़ा रास्ता जब सिर्फ चलते रहने की धुन सर पर हो
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तलाश नौकरी-हमारी कहानी का किरदार क्या जानोगे
हमारी कहानी का किरदार क्या जानोगे हम तो अपना ही यार को छोड़ बैठे है सिर्फ उसके साथ रहने से अगर मिल जाती मंजिल तो क्या बात थी
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खेत होगा खलिहान होगा -चौड़ी सड़कें घर आलिसान होगा
काव्य रचना - ना कोई इंसान होगा सूरज होगा चांद होगा ये धरा और आसमान भी होगा, पर्वत होगा श्मशान होगा पर मुझे लगता है ये इंसान न होगा। खे
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करते नहीं विचार जो-उल्टे सीधे काम से
#विधा:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" करते नहीं विचार जो,उसे बुद्धि है भ्रष्ट। उल्टे सीधे काम से,करे प्रगति को नष्ट। और गँवा�
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अपने को जो मानते-करता दृढ़ किरदार
#विधा:-मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" अपने को जो मानते,लगते हैं दिलदार। ऐसा दिल अब है लगा,करता दृढ़ किरदार। ऐसे दृढ़ किरदा�
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माया जोड़ी रात दिन-सबल किया परिवार को
#विधा:- मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" माया जोड़ी रात दिन,लिया बहुत ही दर्द। सबल किया परिवार को,बना रहा दृढ़ मर्द। हँसकर आगे को
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जलता दीपक आस का-हृदय चाहता खास
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" जलता दीपक आस का,हृदय चाहता खास। लब से निकले प्रेम ही,मिटे सभी की प्यास। सफल भव्य किरदार स
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प्रेमश्वर की भक्ति में-जीवन करें निसार
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" प्रेमश्वर की भक्ति में,जीवन करें निसार। जीवन होगा तब सफल,सुखी रहे परिवार। चले वंश तब वृ�
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औजार-जिसके सहारे बना दूं कोई नवीन किस्सा
औजार को भी बना लूं अपना हिस्सा, जिसके सहारे बना दूं कोई नवीन किस्सा। जिसे सुनकर लोगों में खूब जोश जगे, फिर हर मुश्किल आसान ही आसान लगे।
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