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कविताएँ
मेहनत
हाथ में हाथ धरकर बैठने से कुछ नहीं मिलता। सुना है, परिंदो को भी उड़ने के लिए पंख खोलना पड़ता है यह जिंदगी है साहब! यहां मेहनत का बीज जो �
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मीट्टी का श्रंगार
छांव में धूप की रोशनी है, उज्जलों में तेरी गजरती है,कई रास्ता हवाओं में रेह जाती है, नमी तेरी इस मीट्टी के कण-कण में, धरती का श्रंगार| हि
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सून ऐ मेरे खूदा
अंधेरों में शाम की तलाश तेरी फिजाओं में गुमसूम सी आवाज तेरी मौजूद है, जिंदगी में सभी कैद हुऐ हम जंजिरो में अरमानों में रोशनी तेरी फि�
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मन के मुलायम
कविता -मन के मुलायम चल कर अपने जीवन पथ पर बदला समाज अपने बल पर निज प्यार लुटाया कर भरकर की राजनीति खूब चढ़ बढ़कर अर्पित है सुम�
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दहेज की आग
दहेज की आग एक रसोई से धुआँ उठा, आग लगी, लपटे बाहर निकली, शोर में कुछ चीखें चिल्लाती, भीड़ में लोगों की कानों आयी, बचाओ-बचाओ, कोई बचाओ, आग
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मेरी प्यारी मा
मा तो सबकी प्यारी है ये तो सबसे न्यारी है। मा के जैसा कोई नहीं है ये कहती दुनिया सारी है।। मा तो कभी भी कुछ ना कहती वो तो हमेशा चुप ही रह
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तुम कैसी मां हो?
कविता -तुम कैसी मां हो? फेंक चलीं क्यों ?दिल रोता है! कूड़े में अब दम घुटता है! अंदर ही अंदर दहता है! कितनी विह्वलता है ! मां की
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खुदा के लिए पेगाम
मेरी गलीयों से गुजरी हवायें काली मेंघन बरसे भिंगे फिजाऐ कहते है, बन्दे सभी पंख मिले तो उड़ चले हम आसमान की ऊंचाई में, ईरादे टूटी हुई ब
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हम बच्चें
हम बच्चे मन के सच्चे नहीं किसी से लड़ते हैं। पर,कभी-कभी किसी बातों पर आपस मे बहुत बिगड़ते हैं। हम बच्चे जब स्कूल जाते हैं वहाँ भी मस्ती क
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ज्ञान की बाते
मन में बाते आती उतनी सोच रहे हम बैठे कितनी। पूरी हम उनको कर पाए काम की हो जो मेरे जितनी।। ऐसा नहीं है कोई काम जिसका न हो कोई दाम। मोल यह
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हिंदी
आओ हम हिंदी का सम्मान करें हम भारतवासी की यह मातृभाषा है। क्यो ना इसका सम्मान करें? हिंदी है भारत की बिंदी इससे है राष्ट्र का सम्मान।
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बचपन
कहाँ गया मेरा बचपन आज भी उसे मैं खोजता हूँ। बस,उसे याद करके मायूस हो जाता हूँ। कितना खुश था,जब बचपन मे था। आज जब युवा अवस्था हूँ तब जि�
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