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घडी
ये वक्त ठहर जा दो घडी मैं साथ में चलने बाला हूँ तू क्यों जल्दी में रहता हैं मेरा काम थोड़ा अभी बाकि हैं कुछ सांस् बचे खत्म कर लु फिर ते
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प्रकृति का केहना है
प्रकृति का केहना है मेरा सुंदर वन धीरे-धीरे सुख रहा हैं। भरी-भरी नदियों का पानी नाजाने कहा खो रहा हैं। प्रकृति का केहना है मेरी साफ ह�
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चिंगारी जलाये रखो
कुछ भी हो मुस्कुराते रहो हालत अच्छे हो या बुरे खुद को आजमाते रहो बक्त के साथ साथ बदल जायेगा बक्त भी बस समय समय पे खुद को खुद से मिला�
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तू फूल बनके
तू फूल बनके खुशबू फैलाती रहे मैं कटा ही सही तेरे बाग़वा का तू काली सी मुस्कुराती सदा खिल खिलाती रहे बहार बनके के यु ही गुलशन महकाती
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क्यों खत्म हुआ
पक्षियों का चहचहाना क्यों खत्म हुआ सुभप्रभात के पावन बेला में कहा गुम कोयलिया के गीत पपिहा के मनमोहक नृत्य बाबू जी के सुबह सुबह के �
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होली आई है
कान्हा !लगता है होली आई है। मस्ती ,में सब डूबे हैं जी भर कर सब गा रहे हैं । हर पल को रंगीन बना रहे हैंl लगता है कान्हा होली आई है l मैं इ�
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बह चली बसंती वात री
कविता - बह चली बसंती वात री। बह चली बसंती वात री। मह मह महक उठी सब वादी खिल उठी चांदनी रात री। सब रंग-रंग में रंग उठे भर अंग अंग मे�
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मैं हु एक पेड़
मेहु एक पेड मेहु बच्चो का साथी। मेहु थकियारोंका आराम कक्ष मेहु पंछीयोंका घर। कोई हैं निर्भर मुझ पर कोई हैं रेहता जिंदा मुझ पर। में भ
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ब्राह्मण कोन है? बात कड़वी जरूर हैं पर सत्य है। By Arjun Sharma
सभी से निवेदन है कि यह कोई कहानी नहीं हैं बल्कि सत्य पर आधारित एक घटना हैं जो वर्तमान में ब्राह्मणों के साथ बीत रही है। ये बात अर्जुन श�
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वक्त
1). हम गुजर चुके हैं उस वक्त से, जब हम भी आबाद थे, थे नाम हमारे भी कुछ, पर अब हो गए बेनाम थे। 2). क्या थी वह समय की ख़ासियत, जो बदल गई ह�
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हवा
हलकी फुलकी हु। वजन में कम ही रेहती हु। जहाभी जाती हु सुकून दे आती हु। जब जब गर्मी आती हैं प्यारसे मुझे बुलाते हैं मेरी एक झलक के लिए ना
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रंग ना होते तो केसा होता
ख्याल आया एकबार रंग ना होते तो दुनिया केसी होती। १९५७ के फिल्मों जैसी होती। सात रंगो वाला इंद्रधनुषभी होता बे रंग। ना होता कोई काला �
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