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कविताएँ
भारत का अन्नदाता
नज़र नहीं आता क्या ? इन्हे आसमान , जो इतनी मेहनत के बाद भी थक-हार के ज़मीन पे आराम नहीं चाहता । कौन है । ये आखिर अपना भाग्यविघाता । जो
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प्यार हो रहा है-जाने अनजाने में मुझे
प्यार हो रहा है उसकी हर बात पर मुझे ऐतबार हो रहा है जाने अनजाने में मुझे उससे प्यार हो रहा है... खुदा जाने क्या जादू कर गई वो हर पल मेरी �
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हाड़ कपावै थर थर ठण्डी
हाड़ कपावै थर थर ठण्डी माह दिसम्बर चहुं दिगम्बर छाया कुहरा धरती अम्बर, न आगे न पीछे सूझै काव करी कुछ मन न बूझै ठंडी कै बढ़ि गै प्रको�
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क्या है तेरे मेरे पास
आपस में न लड बंदे क्या है तेरे मेरे पास मन मोटाव से काम न चलता घमंड का मुखौटा का न बना साथ आपस में न फुट हो हम सब फुट से होती नुकसान ज�
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मेरे खेत की आंखें मुरझाई हैं
मेरे खेत की आंखें मुरझाई हैं। लगता है बारिश देर से आई है ।। देर से आई पर आई । फिर खेत में वही रौनक छाई ।। गर्मी का ताप मेरी फसलों पर छाया
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साली के बिना ससुराल
*साली के बिना ससुराल* आज रविवार का दिन था सुबह-सुबह अखबार पढ़ रहा था तभी पत्नी ने मेरी ओर नाश्ता की पलेट बढ़ाई। नाश्ता करके मैंने ब्ल�
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दीपक-प्रकृति प्रकृष्ट सार से
प्रकृति प्रकृष्ट सार से, बना दीपक। स्निग्ध, बाती, जोत, रखा प्रदीपक। तेल, बाती संयोजन से, प्रज्वलित धक-धक। दीपन, मापन, रोधन, हस्त समापक।
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भारतीय संविधान सुरक्षा सम्मान
स्वयं से दूर हैं बहुत मजबूर हैं उनके आसाओं को जग से मिलने आया है BS4 आया है कुछ लोग दबाएं कुचले गए हैं, समाज से कटे हुए है उन्हें उनका ह�
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मेरे पिता जी
जब-जब मैं उनको देखता हूं, मैं अपना बचपन उनमें झांकता हूं जब वो कुछ बोलतें कुछ भुलतें हैं ये बुजुर्ग-ये-उम्र है मैं मानता हूं मैं अपना ब
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कब तक तिजारत चलेगी दहेज का
कब तक तिजारत चलेगी दहेज का,कब तक बेटी सहती रहेगी समाजो के डेह का।क्या आज भी लोग गुमनामी मे खोये है, चादर तान कर सोये है।पता नहीं कितने म�
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लक्ष्मी का रूप हैं नारी
स्त्री तेरी कहानी बड़ी पुरानी, काम काज घर वार में सिमटने वाली, पढ़ लिखकर भी घर में रहने वाली, आगे बाहर ना निकलने वाली, घर परिवार की सेवा
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याद जब भी वो हमको आए हैं
याद जब भी वो हमको आए हैं आंखों से आंसू रोक ना पाए हैं ऐसी भी क्या गुस्ताख़ी हो गई थी हमसे जो सजा पाए हैं जन्मों का रिश्ता एक पल में ठुक�
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