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देश-प्रेम
बस एक नाम बस नाम नाम
है अविचलताओं कि करूण धरा, मिट्टी आज़ादी की निशानी है! है शुज्ला, सफ्ला देश मेरा, वतन परस्ती जिसकी कहानी है!! हर ज़र्रों के एहसा
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अरूनोदय की आश लिए
मैं सोंच रहा था पवन तपोवन, अंतर मन के दृड़ चेतन से! अंधकार की विफल चेष्टा, अरूनोदय की आश लिए!! करूण चेष्टाओं की ध्वनी,
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रश्मी रथी बनु
समा बांध अविराम करे, आशाओं के चाहत पल पल! नयनो के गतीमय प्रगतीमान, उठती है दर्रख्तें कल कल कल!! अती अती अतिश्य चर्म कर्म,
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टिकाकरण अधिकार अपना
कर्म योग अती पावन निष्ठा, छल भी छलीत हो जाती है! बलवान कि हिम्मत भी आकर, अधरों मे दलीत हो जाती है!! पर्वत कहां झुकते है नदियों
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ভারত বিজয়ী পথে
সোনার মনে স্বর্ন স্বপনো, চলে চোখের বনে! সান্ধিন্তার ই সারা ভারত, ভিন্জে সে সাবোনে!! কর্মো গড়িতে দিলো আবাজ, স্বর্ন �
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भारत को अचल संतृप्त करूं
कहता अभिनन्दन कर अभीवादन, ज़रा तम अधरों को दिप्त करुं! भरकर उजियारा अंधकार मे, धरा को ज्ञान से लिप्त करूं!! धरती कि शख्तियां
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आर्यावर्त समय
है विजय धरा कि नाज़ कलम, हर कमजोरों कि आवाज़ कलम! कलम दिप्त अरूणाचल पे, नभ पे उज्जवल धरातल से!! समय कि गाथा को लीख - लीख कर, भ�
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हे भारत के वीर जगो
जगा रहें हम जाग - जाग, भारत के उज्जवल नयनों को! जो दिखा सके भारत का भविष्य, इस महा योग सु: ख: चयनों को!! कर्मों से अडीग आराम मिले,
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संघर्षित हिन्दी को कोटी नमन
हिन्दुत्व धरा का ताज़ है हिन्दी, जीसपे कंवलीत ये सम्पुर्ण धरा! लाखों लय,छन्द और ताल है विकसित, नाज़ करे ये हिन्दुस्तां!! यें �
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कर्म प्रबल करना होगा
चाहे हो पहरे महा प्रबल, जीसे उड़ना है उड़ना होगा! चाहे अंधियारों कि महा समर, उसे अपने अनुकूल करना होगा!! करना होगा संघर्ष अधि�
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ऐ पुष्प जरा तू गरज बर्षं
उत्कृष्ठ धरा की उत्कंठा, जगती को दर्द से जगा रही! विश्राम कर रहें विश्व लोक, कर्म मेहनत को ऊठा रही!! विश्व प्रायन कर्म शुलोक,
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उठा शस्त्र कर धरा ध्वस्त
गाती है तरनुम वृक्ष, तरूण, तट, प्राकृती का भी लेख यही! जो पृथक करे विचार धरा कि, कवियों का उल्लेख यही!! है धरा धरी विरों कि कथा
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