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कलयुग का अपराधी
कलयुग का अपराधी मैं अपने पापो का अघाती हूं, मैं सिर्फ तेरे सुख में तेरा साथी हूं, हा मैं जानवरो को काटके खता हु, मैं ही तो कलयुग का अपराध
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स्कूल की रसोइयां पर कविता
स्कूल की रसोइयां राह देखते हैं बच्चे जिनके आने की आस लगाए बैठे रहते भोजन बन जाने की, प्यार परोसा जाता तेरा हर थाली में फिर मिटती है �
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"પોતાની દિશા"
સમયની ચાલને સમજીને ચાલવાની વાત છે, અંધકાર વચ્ચે દીપક બનીને ચાલવાની વાત છે. દરેક ચમકતી વસ્તુને સોનું માનશો નહીં, વિવેકની આંખે દુનિયા
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मजबूरियां का नाम हमने शौक रख दिया
जिस रास्ते पे चल रहे उस पर है छल परे कुछ देर के लिए माथे पे बल परे हम सोचने लगे कि लौट चले क्या फिर सोचा यार छोड़ो चल परे तो चल परे मुश्�
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असफलता ही सफ़लता की पूंजी है
मेहनत बिना कोई काम नहीं, हार कर मुंह मोड़ना ठीक नहीं। मानवीय कानों में यह बात नहीं गूंजी, कि असफलता ही सफ़लता की है पूंजी।। हमे हमेशा
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हे! मानव
हे! मानव हे! मानव तुमने हमको पाला पोसा पेड़ लगाया दाना खिलाया परिवार का एक अंग बनाया, हमें गर्व था हम इंसानों के बीच में हैं तुम्हे
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### मेहर रब दी
तोबा कयामत बक्से खुदा ऐसी नयामत हर रोज मुझ पे ही बरसे ।।
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नारी पर अत्याचार
तेजी से बदलते इस दुनिया मे, हमारा क्या कोई मान नहीं। प्रतिदिन होता हमारा अपमान, क्या हम कोई इंसान नहीं।। कभी डायन, कभी चुड़ैल कहकर, क�
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स्वच्छता
स्वच्छता ही आधार शैली, स्वच्छता ही विकास की सीढ़ी। स्वच्छता बिना विकार आया, हरेक को दुर्बल बनाएं।। जब हो सफाई तन - मन से, तब लगे हर कार
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नरम हवाएं हैं
ग़ज़ल आज तो नरम हवाए हैं, बेरुखी में अदा जगाए हैं। लोग आज ख़ुशी रगों में रख, प्यार को ही आजमाए हैं। खाल बात की मत निकालो जी, सत्य बा�
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बदलाव ही है जरूरी
चलते चलते बोझिल होने पर ठहराव ही है जरूरी, रहते रहते एक ही छत के नीचे बदलाव ही है जरूरी। संसार में गम बहुत हैं इसलिए प्यार निभाना ही है
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प्यार जिंदगी
(मुक्तक छंद) 01 जिन्दगी को मैंने इस कदर देखा जिन्दगी मुझ में डूब गई। मेरी हर चाहत को पूरा करने के लिए मुझ में डूब गई। अब आलम यह है कि सारी
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