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लीपा पोती चल रही-माता के जो भक्त चमक रहे घर द्वार अब
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" लीपा_पोती चल रही,माता के जो भक्त। चमक रहे घर द्वार अब,बना रहूं हम सख्त।। लीपा_पोती चल रही,द�
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एक जरा सी भूल से-भारी हो नुकसान
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" एक जरा सी भूल से,भारी हो नुकसान। और व्यर्थ चिन्ता रहे,जाते घट है मान।। एक जरा सी भूल ने,ले ल�
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काला है कुछ दाल में-बाहर से है रंग
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" काला है कुछ दाल में,बाहर से है रंग। लौटे जो बेरंग हो,देख सभी हो दंग।। काला है कुछ दाल में,आँ�
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मन पापी माने नहीं-भागे सबसे तेज
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" मन पापी माने नहीं,भागे सबसे तेज। हर दिन कुछ है सीखता,पढ़ता हरेक पेज।। मन पापी माने नहीं,कर�
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राम की प्रतिज्ञा-14 वर्ष वनवास किया
प्रेम से जिसने जग को मोह लिया, आपने पिता के वचनों के खातिर, राज -पाठ से भी मुंह मोड़ लिया, 14 वर्ष वनवास किया, हर कठिनाई से लड़ने का प्रयास �
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एक जरा सी भूल से-भारी हो नुकसान और व्यर्थ चिन्ता रहे
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" एक जरा सी भूल से,भारी हो नुकसान। और व्यर्थ चिन्ता रहे,जाते घट है मान। मंद पड़े तब हौसला,आ�
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उनको भी तो हो पता-मुझको उनसे प्यार एक जरा सी भूल हो कर दूं मैं इजहार
#विधा:_कुंडलिया छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" उनको भी तो हो पता,मुझको उनसे प्यार। एक जरा सी भूल हो,कर दूं मैं इजहार।। कर दूं मैं इजहा�
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एक जरा सी भूल-नुकसान करती भारी पीछे और धकेल
#विधा:_रोला छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" एक जरा सी भूल,नुकसान करती भारी। पीछे और धकेल,चलाए मुझ पर आरी।। रहे निकलती आह,दर्द को फिर दि�
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एक जरा सी भूल से-भारी हो नुकसान और व्यर्थ चिन्ता रहे
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" एक जरा सी भूल से,भारी हो नुकसान। और व्यर्थ चिन्ता रहे,जाते घट है मान।। एक जरा सी भूल ने,ले ल�
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धरती मां की बात है निराली-सदियों से ये हमसब को है पाली
धरती मां की बात है निराली, सदियों से ये हमसब को है पाली। ममता की जी अदभुत खजाना है, इनसे से ही दुनिया है चल रही। ग्रहों में जो सबसे उत्त
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अपनी औकात-पहली दफा ही दिखा गई
कमब्त, खामोश सा बैठा था। दिल एक जगहाँ के, मन को अचानक एक दंगाबाज की याद आ गई। वो सात जन्म का वादा कर के पहली दफा ही अपनी औकात दिखा गई ।
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अपनी औकात-पहली दफा ही दिखा गई
कमब्त, खामोश सा बैठा था। दिल एक जगहाँ के, मन को अचानक एक दंगाबाज की याद आ गई। वो सात जन्म का वादा कर के पहली दफा ही अपनी औकात दिखा गई ।
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