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हास्य-व्यंग
मोबाईल का दौर-जो हर किसी के हाथ में सजता हर तरफ बस यही हैं बजता
"मोबाईल का दौर" जो हर किसी के हाथ में सजता हर तरफ बस यही हैं बजता जीवन का ये अहम हिस्सा हो गया दिनचर्या का तो जैसे किस्सा हो गया वैसे कि�
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हर घर का सवाल-घर घर एक कहानी
"हर घर का सवाल" हमारे यहां हर घर की यही कहानी आज खाने में सब्जी क्या बनानी वैसे सब्जी का यह मुख्य सवाल हर दिन सुबह शाम का बवाल सुबह का स�
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रंजिश-जीतने की चाहत मे कभी किसी खेल को मत बिगाडीए
एक, जीतने की चाहत मे कभी किसी खेल को इतना भी मत बिगाडीए । कि उस खेल का अपना कोई महत्व ही नहीं बचे। और वो खेल नहीं आपसी रंजिश बन जाए।
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पेड़ों से गिरते पत्तों को देख अहसास हुआ-अभी मौसम पतझड़ का है
पेड़ों से गिरते पत्तों को देख अहसास हुआ। अभी मौसम पतझड़ का है। अभी वक्त सब्र का है । ये इन्तजार जरूरी है। ये इम्तिहान जरूरी हे। जब हा�
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मच्छर महाराज-इन मच्छर महाराज का करो जल्द संहार
*मच्छर महाराज* *हास्य व्यंग कविता* *रचयिता ---अखिलेश श्रीवास्तव एडवोकेट जबलपुर* कीटों के सरताज तुम हे मच्छर महाराज अपने अंदर छुपा र�
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सिलसिले-कितने बिखर गए युहीं चलते रहे सिलसिले
एक नज्ब एक सवाल पर कितने बिखर गए यहाँ, युहीं चलते रहे सिलसिले और लाखों मर गए , उलझने कम कहाँ हुई । जिन्दगी मे लौग इघर के ऊघर गए ।
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मेरी मुस्कान-लोग जल जाते हैं मेरी मुस्कान पर
लोग जल जाते हैं मेरी मुस्कान पर क्योंकि, मैंने कभी दर्द की नुमाइश नहीं की... ज़िंदगी से जो मिला कबूल किया, किसी चीज की फरमाइश नहीं की... म�
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हाड़ कपावै थर थर ठण्डी
हाड़ कपावै थर थर ठण्डी माह दिसम्बर चहुं दिगम्बर छाया कुहरा धरती अम्बर, न आगे न पीछे सूझै काव करी कुछ मन न बूझै ठंडी कै बढ़ि गै प्रको�
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साली के बिना ससुराल
*साली के बिना ससुराल* आज रविवार का दिन था सुबह-सुबह अखबार पढ़ रहा था तभी पत्नी ने मेरी ओर नाश्ता की पलेट बढ़ाई। नाश्ता करके मैंने ब्ल�
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मुझको बनाना-तालियों की गूंज में बडा ही सुख पाऊगा
मुझको बनाये तो बनाना नहीं कभी ट्रक, माल व्यापारियों का ढोके मर जाऊगा ! मुझको बनाये तो बनादे रोडवेज़ बस, गोरी -गोरी गोरियों को लेके घूम
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बैठो रजाई में सिकुडो- सर्दी में कुकरावै
बैठो रजाई में सिकुडो, सर्दी में कुकरावै ! बुढिया घर में भात बनाऐ,बुड्ढा बाहर से डकरावै !! ऐरी लाये दे दियासलाई ,थोड़ी घास में बारूं ठंड �
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मेरी मुटल्लो छम्मक छल्लो
वन्टी सन्टी पिन्टू गौरव सबकी वीवी सुपर- डुपर ! मेरी मुटल्लो छम्मक छल्लो करती रहती लवर लवर !! उनकी वीवी स्वविगफूल में खूब नहाती तैर- तैर
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