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गांव-वो दौर वापिस ले आओ उस गांवों मुझे घुमाओ

Abhinav chaturvedi 06 Jan 2024 कविताएँ अन्य @Abhinav chaturvedi #गांव कविता 27621 0 Hindi :: हिंदी

आज सुबह हुआ करता है।
कलः भोर हुआ करता था।
नाना-नानी के गांवों में एक छोर हुआ करता था।
जीवन कटते-कटते चल रहा,
मन अटके-अटके कह रहा।
मन की सुन लो ओ भाई।

वो दौर वापिस ले आओ,
उस गांवों मुझे घुमाव।। ×2


पहले सुबह होता था किरणों से।
आज सुबह होता मिन्नतों से।
नास्ते बासी-पुराने होते हैं।
पहले बासी, ताजे होते थे।
समय का चक्र बदल रहा है।
कोई चक्र उस ओर घुमाओ,


वो दौर वापिस ले आओ।
उस गांवों मुझे घुमाओ। ×2


पहले हरियाली दिखती थी।
आज केवल क्यारी दिखती है।
गिनती के पौधों में, जीवन कि न्यारी दिखती है।
माना झोंका हवा का आएगा,
यादें बिसरी-पुरानी लाएगा।
मन तभी कहता है जोरों से,
हवा..... वो ही चलाओ,


वो दौर वापिस ले आओ।
उस गांवों मुझे घुमाओ। ×2


पहले पानी का घड़ा भरता था।
तब ठंडे-ताजे होते थे।
आज पाप का घड़ा भर रहा है,
जो कहते सीधे-सादे होते हैं।
उनकी नैया ईश्वर बचाये,
जन्म पर दो-चार पेड़ लगाएं।
कहें ईश्वर तुम ही बचाव,

वो दौर वापिस ले आओ।
उस गांव मुझे घुमाओ। ×2

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