Mukesh Namdev 02 Oct 2023 शायरी समाजिक जरूरतें,दौलत,गिरेबान,जमीन,ललकारेगें 26739 0 Hindi :: हिंदी
"जरूरतें"
"अब हमारी जरूरतें बढ़ गई हैं,इसलिए दौलत की गिरेबान खींचने की ताकत बढ़ गई है,अब शौक ऊंचे-ऊंचे पालेंगे,जमीन पर खड़े होकर आसमान को भी ललकारेगें"
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