Rakshi 15 Feb 2025 कविताएँ अन्य 31402 0 Hindi :: हिंदी
ज़माने भर का ग़म उठाए फिरते हो क्या रंज है जो छिपाए फिरते हो कभी तो आओ देहरी पर हमारे हर गम को भूल जाओगे शब से पहले गर मुस्कुराओगे तो जिंदगी गुलज़ार हो रोने से कौन से मसले सुलझाए बैठे हो हंसोगे तो हंसेगी दुनिया तुम्हारे साथ आंसुओं पर तो गुमनाम बैठे हो जिंदगी जंग है जीतोगे गर हिम्मत की हारोगे गर गैरों से उम्मीद लगाए बैठे हो जिंदा हो तो नजर आना जरूरी है दुनिया मां का आंचल नही जो मुंह छिपाए बैठे हो रुखसार परवीन