Anilkumar Rathwa (Sameer) 07 Jan 2026 कविताएँ समाजिक "उत्थान" 6050 0 Hindi :: हिंदी
“सुबह तो रोज़ होती है… सूरज हर दिन उगता है… पर सवाल ये नहीं कि दिन कब निकला— सवाल ये है कि इंसान कब जागा? भीड़ में चलना आसान है, पर खुद की राह चुनने के लिए हिम्मत चाहिए। आँखें खुली हों और ज़मीर सोया हो— तो ज़िंदगी बस चलती है, बदलती नहीं। अलार्म नहीं बदलता तक़दीर, बदलाव उस दिन आता है जिस दिन भीतर की आग जलती है। याद रखना— अंदर से जागना ज़रूरी है, क्योंकि सुबह तो रोज़ हो जाती है।” ✍️ — Anilkumar Bamaniya Sahitya Live | Motivational & Social Poetry