Rajnish khandal 27 Feb 2025 कविताएँ समाजिक #sanknadh #motivation 32234 0 Hindi :: हिंदी
उठो चलो अब दाव दो,
ये शंकनाद हो चला,
ये सूर्य भी है बोलता,
ऐसे जीतोगें कैसे भला ???
खिली धूप इस दोपहरी की,
अब सूरज सिर पर आ गया,
उठो चलो दौड़ों अभी,
वह लक्ष्य है बुला रहा।
तुम देर तक सोते रहोगे तो,
मरने का मोका पाओगे। (अर्जुन के जैसे)
कृष्ण सा खिलाड़ी ना मिला तुम्हें तो,
सदा के लिए सो जाओगे।
उठो चलो अब दाव दो,
ये शंखनाद हो चला,
ये सूर्य भी है बोलता,
ऐसे जीतोगें कैसे भला ???
ऐसे देर तक सोते रहे तो,
समर में हार जाओगे,
अगर देर से रण में पहुंचे तो,
कायर कहलाओगे।
अभिमन्यु सा वार कर,
उस चक्रव्यूह को तोड़ दो,
अर्जुन सा योद्धा बन,
उस आंख को फोड़ दो।
यह सूर्य एक संदेश है,
"मोर्निंग गुड" नहीं आदेश है,
वो लक्ष्य बाट है निहारता,
कि कब वो वीर यहां पहुंचता ???
उठो चलो अब दाव दो,
ये शंखनाद हो चला,
ये सूर्य भी है बोलता,
ऐसे जीतोगे कैसे भला ???
सो के कल की सोचना ही,
बुद्धि का संहार है,
उठ के अब ही दौड़ना ही,
जीत की गुहार है।
तुम चक्रव्यूह में मारे गए तो,
अमर.. हो जाओगें,
भविष्य तुमको पूजेगा,
और देव.. कहलाओगें।
सोए अब ही रह गए तो,
राख में मिल जाओगें,
सब चूस के जिसकों फेंक दें,
वह गुठली बन जाओगें।
उठो चलो अब दाव दो,
ये शंखनाद हो चला,
ये सूर्य भी है बोलता,
ऐसे जीतोगे कैसे भला ???
रचनाकार = रजनीश खाण्डल