Santosh kumar koli ' अकेला' 17 Aug 2024 कविताएँ समाजिक समय की सोच 23217 0 Hindi :: हिंदी
यह अनुभवियों का कहना, सबसे भला कभी नहीं रहना। सबसे भले के चक्कर में, खुद का भला जाते भूल। सबसे भले रहने वाले के, पीछे उड़ती राख- धूल। सबसे भले रह न सके, ईश्वर, खुदा, रसूल। कांटे से निकलता कांटा, यह कुदरत का उसूल। सबसे भले की भावना में, कभी नहीं बहना। सबसे भला कभी नहीं रहना। औरों ही औरों की क्या, खुद के भले की भी सोच। सबसे भले की सोचना, है सोच की मोच। यह मज़बूती नहीं, है कदराई भावनाओं की लोच। इस दबाव से खुद का, जीवन रहता लोच पोच। कान तोड़े ऐसे सोने का, उतार फेंको गहना। सबसे भला कभी नहीं रहना। यह अनुभवियों का कहना, सबसे भला कभी नहीं रहना। पहले ज़माने में रहते होंगे, अब ज़मानासाज़ी में समझदारी। अब क़दम- क़दम पर कपट, मतलब की होशियारी। आज लोग काम निकालकर, कहते बेचारा, बेचारी। हमेशा हां की हाज़िरी, है तलवार दुधारी। बुरा कहें तो कहें, चाहे पड़े अकेला चलना। सबसे भला कभी नहीं रहना। यह अनुभवियों का कहना, सबसे भला कभी नहीं रहना।