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पुष्पों कि आभा खिलती हैं-जब दैव शरण वो जातें हैं

Amit Kumar prasad 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक " मनुष्य: कर्मणा विवक्षित्त: भवत्ती! " This poem is on the base of unity. And, During this poem has shown the way of humanity who has been shown loard.And equality is to be pillar of Welfare. And with it talk my description to be complete. And to it, Jai Hind.. 🌹 44904 0 Hindi :: हिंदी

पुष्पों कि आभा खिलती हैं, 
जब दैव शरण वो जातें हैं! 
वो दिपक और प्रदिप्त जले, 
जो शरण दैव का पातें हैं!! 
                      प्रभुत्त्व धरा का मान प्रबल, 
                      श्री कृष्ण ने जिनको धारा था! 
                      स्वाभीमान‌ विभुर कोमल विवेक, 
                      धर्म का करूण सहारा था!! 
जन्मे श्रत्रीय वंश चन्द्रवंश, 
मानवत्ता का विज्ञान‌ धरें! 
यादव कुल मे थे पले - बड़े, 
भारत जिनका अहवान करें!! 
                     माता के पुत्र थे यशोदा के, 
                     देवकि मा आशिश लुटाती थी! 
                     युग के प्रथम राजनितीज्ञ पुरुष, 
                     गुण से न धरा अघाती थी!! 
बड़ा नही भया बल से कोई, 
बड़प्पन ज्ञान झल्काती है! 
सम्त्ता का दिव्य प्रमार्थता,
बड़ - बड़ के शुधा पिलाती है!! 
                   गर धन को ईश्वर दान मिले, 
                   शक्ती को अचल सम्मान मिले! 
                   फिर रथी बने क्यों चन्द्रवंशी, महाभारत मे, 
                   शुद्रों को समता देने!! 
संत बने ईच्छा से परे, 
भारत का लेकर भार अचल! 
चल - अचल वेदना का महा धनी, 
श्री कृष्ण ज्ञान का अभीनंदन!! 
                   जिसकि गाथा को पढ़ कर, 
                   अर्जुन ने धर्म का साज स्वारा था! 
                   कौरव विनाश विर्जेश नंदन, 
                   भारत का अह्म सहारा था!! 
श्रेष्ट नहीं जग मे कोई, 
नश्वरता ढ़ुढ़े करूकश्रेत्र! 
अमर धरा पर कर्म हुआ, 
श्री कृष्ण कि गीता का उपदेश!! 
                      नही जान उस हृदय मे, 
                      निज कि खातीर जो जीता है! 
                      वो हृदय अशल मे महा पुज्य, 
                      करोड़ों कि व्यथा से धड़कता है!! 
है!अह्म नमन भारत कि धरा, 
और जगती का अह्म वो बलवित:! 
ज्ञान लक्ष्य प्रम श्रेष्ठतम, 
है!उचित्त वर्ण ईक ज्ञानी का!! 
                   गर अचल ज्ञान सम्मानों का, 
                   जिस हृदय मे पुष्पित हो जाएगा! 
                   वो कर्म बनेगा वासुदेव, 
                   बिर्जेश नंदन कहलाएगा!! 
नंदन भारत का आर्य पुत्र, 
जीस सुत्र ने धरा को धारा है, 
हर वर्ण मे धारें दशावतार, 
जो धर्म का अमुल्य ईशारा है!! 
                   मिलती न इज्ज़त डराने से, 
                   वरना कंश भी बली कुछ कम ना था! 
                   रावण का भी ज्ञान था महा प्रबल, 
                   उन्की भी भक्ती नम ना था!! 
है अचल मेखला भारत वर्ष, 
हम जम्मुद्विप के नाज़ प्रबल! 
हर छल को ज्ञान से तोड़े तभी, 
कहलाऐं वसुधा के नंदन!! 
                   सत्य भले दयनिय होती, 
                   पर राह एक दिन पाता है! 
                   ज्यों बने अर्जुन श्री कृष्ण पार्थ, 
                   संघर्ष सत्य पा जाता है!! 
इस महा धरा पर ले - ले कर, 
विष्णु अवतार गुरू ज्ञानी का! 
देतें ही रहे मानवता का विवेक, 
नर - नारद युग अवतारी सा!! 
                    कर रहा चरित्र जो पुज्य उन्ही का, 
                    चरित्र को जरा चरित्रवान करो! 
                    धर के धरती का भार प्रबल, 
                    विश्व धारक विष्णु का चरित्र धरो!! 
विचित्रता मे चित्रीत मान प्रबल, 
जो रथ चला शुद्र को मान दिए!
कहीं जन्मे कहीं पे पले - बड़े, 
माओं का अह्म अभीमान बने!! 
                   भारत है ऋणी उन करूणा का, 
                   कण - कण को प्रेम जो वारा है! 
                   सम्त्ता वसुधा का है विवेक, 
                   सम्त्ता ही धर्म का ईशारा है!! 
जातीवाद से बटें राष्ट्र, 
शक्ती ना ज्ञान दर्शात्तें‌ हैं! 
वो दिपक और प्रदिप्त जले, 
जो शरण दैव का पातें हैं!! 
                     कस्तुरी ले कुण्डली मे छटपटा हिरण, 
                     सुगन्ध भेद नही पा सकता! 
                     ज्ञान चरित्र मे होता है, 
                     जिसे छला नही कभी जा सकता!! 
सम्त्ता विकाश कि कसौटी मे, 
आकर ज्ञान खिल जातें हैं!
पुष्पों कि आभा खिलती है, 
जब दैव शरण वो जातें हैं!! 

साहित्य  रथी   :-  अमित कुमार प्रशाद
Literature
Charioter    :-  Amit Kumar Prasad

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