Savita singh 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक एक मां की कहानी 34548 0 Hindi :: हिंदी
ताउम्र जिस घरौंदे को ,
संवारने में निकाल दी ।
सब उड़ चले मुझे भी,
निकलने की सलाह दी।
जाओ..... सब के सब
मर्जी तुम्हारी,
आंखों में दिख रही
खुदगर्जी तुम्हारी ।
रह लूंगी मैं तन्हा
इस दरों -दीवार में ,
जीत भी मेरी है
मेरी इसी हार में ।
अपने बनाए वसूल पर ही
अब उम्र गुजार दूंगी...
बस........
तुम कोई घरौंदा न बनाना
अपने तजुर्बे से तुम्हें
यही सलाह दूंगी ।।
ताउम्र जिस घरौंदे को
संवारने में गुजार दी।
सब उड़ चले मुझे भी
निकलने की सलाह दी.....
सविता सिंह