Santosh kumar koli ' अकेला' 09 Feb 2025 कविताएँ समाजिक मेल 32943 0 Hindi :: हिंदी
तोता बोला कबूतर से, दिनों बाद याद आई। पंख फड़फड़ा बोला कबूतर, मेल नहीं बैठा भाई। कर टे टे तोता बोला, यह क्या होता है मेल? गुटरगूँ- गुटरगूँ बोला कबूतर, सुन मेल का खेल। चाहे दीर्घाकार हो डील- डौल, नहीं हड्डी मांस का मेल। अस्थि पेशी अपनी मस्ती, डील अंजर पंजर हेल। चाहे झील से गहरा हो रिश्ता, नहीं आपस में मेल। ऊपर निभता- सा दिखे, अंदर चुभता शेल। साथ खाओ, उठो- बैठो, नहीं वैचारिक मेल। ऊपर -ऊपर ठीक-ठाक, अंदर खाने नकेल। कितना ही करो कर्म नहीं कर्म वक्त का मेल। करते रहो करते रहो, अंत बिगड़ेगा खेल। बैठे नहीं मनोदशा का मेल, प्रसन्न भी खिन्न, वैजन्य रेल पेल, यदि मेल का भी नहीं बैठे मेल, तो मेल भी नकली हमेल। चौतरफा इस दुनिया का, नहीं बैठेगा मेल। यह दुनिया यूं ही चलेगी, खाती धका- पेल।