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दुर्गन्ध

नितिश सरोज पाण्डेय 07 Feb 2025 कविताएँ समाजिक poetry, social, girlchild 18730 0 Hindi :: हिंदी

सुबह अलसुबह
चौराहे से गुजरते हुए देखा
मोड़ के किनारे से लगे
कूड़ाघर से आती दुर्गन्ध से
आने जाने वाले सब परेशान हो रहे थे

कोई नाक पर हाथ रख कर
तो कोई अपनी साँसे रोक कर
कोई आँखों को बंद करके
अपनी अपनी राह निकल जा रहा था

हिम्मत जुटा कर पास गया
कुछ अपरिपक्व से मांस के टुकड़े
बिखरे पड़े थे, मक्खियाँ भिनभिना रही थीं
कुत्ते मांस नोच रहे थे

सहसा एक बालक ने पूछा “ये क्या है”
बदले में मैंने कहा ये तो
किसी के घर का सम्मान है जो बिखरा पड़ा है

कोई लक्ष्मी है , कोई दुर्गा है
कोई काली है तो कोई गौरी है
किसी के हाथो की राखियाँ है
किसी माँ का दूध है
किसी घर की पहचान है
तो किसी पिता का किया कन्यादान है
एक अजन्मी सी आशा है
एक धुंधला धुंधला चेहरा है
कुछ बिखरे बिखरे सपने हैं
कुछ विवशता है कुछ धोखा है

लड़का जाने क्या समझा कुछ उलझा
कंधे बिचका कर चला गया
मैं वहीँ अपनी आखों में
समंदर रोके खड़ा रहा

मित्र ने गुजरते हुए कहा
अरे दुर्गन्ध और गंदगी में क्यों खड़े हो

मैं बुदबुदाया
गंदगी और दुर्गन्ध यहाँ कहाँ
वो तो हमारे चरित्र में है
यहाँ तो हमारी बेटियां
पड़ी हुई हैं

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